gulmohar

खुद से खुद की जंग

तुम्हारे जाने के बाद ज़िंदगी अचानक खाली हो गई थी। जो आदतें कभी सुकून देती थीं, वही अब चुभने लगीं। तब समझ आया कि सहारे पर जीना आसान होता है, पर खुद खड़े होना सीखना ज़रूरी। उसी खालीपन में मैंने खुद को पहचाना और धीरे-धीरे अपनी ही ज़िंदगी की लड़ाई लड़ना सीख लिया।

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मैं सच को बयां करती हूं

डॉ.नेत्रा रावणकर, प्रसिद्ध साहित्यकार, उज्जैन मैं सच को बयां करती हूंअंगारों पर चलती हूंमैं गीत नए रचती हूंख्वाब नए चुनती हूं गहन तम को चीरकरअरुणिमा जगाती हूंटूटकर बिखरती हूंखुद को पिरो लेती हूं सूरज से आग लिएदीपक से राग लिएधरती का हरितस्वप्नआंचल में सजाती हूं कांटो की पृष्ठ परफूलों की कलम सेवसंत की आस लिएपतझड़…

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इंजीनियर भावना और मैनेजर यश का सम्मान

सांताक्रूज़ पश्चिम में आयोजित कार्यक्रम में ऑल इंडिया यादव महासभा, मुंबई ने सामाजिक कार्यों में सक्रिय इंजि. भावना और प्रबंधक यश का सम्मान किया। समारोह में चंद्रवीर बंशीधर यादव, गिरधारीलाल पंडित, डॉ. अमर बहादुर पटेल और अन्य गणमान्य उपस्थित रहे। यह कार्यक्रम समाज में सकारात्मक योगदान देने वालों को प्रेरित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना गया।

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बहू नहीं कोई देवी हो

यह कहानी नारी के कर्तव्य, परिश्रम और ससुराल में सम्मान पाने की प्रेरक कहानी है। नीरा, स्वभाव से मेहनती, संवेदनशील और न्यायप्रिय, अपने सास-ससुर के प्रति समर्पित रहती है। शादी के बाद पति के ड्यूटी पर चले जाने के बावजूद वह अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं होती।

कठोर व्यवहार और अन्याय के बावजूद नीरा अपने नेकनीयती और परिश्रम से अपने सास-ससुर को उचित सम्मान दिलाती है। उसके इस समर्पण और अपनापन को देखकर परिवार और समाज भी उसे आदर और सम्मान देने लगते हैं। कहानी में नारी शक्ति, सशक्तता और पारिवारिक प्रेम का संदेश प्रमुख रूप से उजागर है।

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दो महिला मित्र मुस्कुराते हुए साथ चलती हुई

मेरी कस्तूरी-सी दोस्त-अंजना

हर किसी के जीवन में एक ऐसा दोस्त जरूर होता है, जो खून के रिश्ते से नहीं, बल्कि दिल के रिश्ते से जुड़ा होता है। अंजना और अर्चना की यह कहानी भी ऐसे ही अटूट विश्वास, स्नेह और अपनत्व की मिसाल है। सात-आठ वर्षों की दोस्ती ने दोनों को एक-दूसरे का हमराज़, सहारा और परिवार बना दिया। फ्रेंडशिप डे पर प्रस्तुत यह भावनात्मक संस्मरण बताता है कि सच्ची दोस्ती समय की मोहताज नहीं होती, बल्कि विश्वास, सम्मान और साथ निभाने से अमर बनती है।

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कवयित्री सुरभि डागर का रचनात्मक चित्र

सुरभि डागर : सादगी, संवेदना और सृजन का सुंदर संगम

रभि डागर समकालीन हिंदी साहित्य की उन रचनाकारों में हैं, जिनकी लेखनी संवेदनाओं को शक्ति में बदलने की क्षमता रखती है। उनकी रचनाएँ जीवन की सच्चाई, रिश्तों की ऊष्मा और स्त्री-मन की कोमलता को बेहद सहजता से अभिव्यक्त करती हैं। वे अपने आसपास घटित घटनाओं को केवल देखती नहीं, बल्कि उन्हें गहराई से महसूस कर शब्दों में ढाल देती हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ बनावटी नहीं, बल्कि जीवन का सजीव प्रतिबिंब प्रतीत होती हैं।

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पुरानी पुस्तकों, पांडुलिपियों और शब्दों के प्रतीकों के बीच विचारमग्न साहित्यकार का कलात्मक दृश्य, जो भाषा, समय और संस्कृति के गहरे संबंध को दर्शाता है।

लफ़्ज़ों की नसों में बहता हुआ वक़्त

प्रो. डॉ. मनु की कविता “लफ़्ज़ों की नसों में बहता हुआ वक़्त” शब्दों, अर्थों और उनकी ऐतिहासिक जड़ों की एक गहन साहित्यिक यात्रा है। यह रचना बताती है कि हर लफ़्ज़ अपने भीतर समय, संस्कृति और मानवीय अनुभवों का एक पूरा संसार समेटे रहता है।

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सोफे पर साथ बैठी माँ और बेटी का भावुक चित्र, माँ को समर्पित हिंदी कविता का दृश्य।

मैं परछाईं माँ की

“मैं परछाईं माँ की” एक भावपूर्ण हिंदी कविता है, जिसमें माँ के संघर्ष, संस्कार, प्रेम और आशीर्वाद को बेटी की भावनाओं के माध्यम से खूबसूरती से व्यक्त किया गया है।

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जो ठहर गए, वही असली कहानी हैं

सत्तर वर्ष की उम्र में जीवन ने सिखाया कि लोग आते-जाते रहते हैं, कुछ बसंत की तरह उजास और उम्मीदें लाते हैं, कुछ शीत की आँधी की तरह चले जाते हैं। युवावस्था में हर विदाई पीड़ादायक लगती थी, लेकिन समय और अनुभव ने यह समझाया कि जो लोग आपके लिए बने हैं, वे हमेशा लौटकर आते हैं। असली खुशी और जीवन की कहानी उन लोगों में है जो आपके साथ ठहरते हैं, आपकी आत्मा को समझते हैं और बिना किसी जोर-जबरदस्ती के आपके जीवन में बने रहते हैं।

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मेरे पापा – मेरी ताक़त”

“जब दुनिया ने मुँह मोड़ा, राहें सब सूनी थीं,
पापा के आँगन में उम्मीदें बस जीती थीं।
हर हार में उन्होंने मुझे मुस्कराना सिखाया,
हर गिरने पर खुद उठकर चलना सिखाया।
पापा — आप मेरे भगवान हैं इस ज़मीं पर,
आपके बिना ये जीवन अधूरा सा है हर पल।”

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