
उज्जैन से प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा की रिपोर्ट
सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन में “भारतीय ज्ञान परंपरा के विशेष संदर्भ में भूगोल विषय” पर केन्द्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन हुआ। इस अवसर पर कुलगुरु प्रोफेसर अर्पण भारद्वाज के निर्देशन में कार्यशाला का शुभारंभ किया गया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में भूगोल विषय के पाठ्यक्रम निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा को समाहित करना है।
कार्यशाला की अध्यक्षता प्रभारी कुलगुरु प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा ने की। मुख्य अतिथि के रूप में प्राचार्य प्रो. कल्पना वीरेंद्र सिंह, प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, शासकीय माधव महाविद्यालय, उज्जैन उपस्थित रहीं। विषय विशेषज्ञ प्रो. आर.पी. तिवारी (पूर्व प्राध्यापक, टीकमगढ़), प्रो. अल्पना त्रिवेदी (भोपाल) और कुलसचिव डॉ. अनिल कुमार शर्मा भी मौजूद रहे।
मुख्य अतिथि प्राचार्य प्रो. कल्पना वीरेंद्र सिंह ने अपने उद्बोधन में महर्षि कणाद के एटम की खोज में योगदान को रेखांकित करते हुए भूगोल में भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रम में समाहित करने पर जोर दिया।
कुलगुरु प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा सदियों से प्रवहमान है और इसमें परंपरा व नवोन्मेष का समावेश निरंतर होता रहा है। उन्होंने भूगोल, इतिहास और नृत्यशास्त्र में भारत की अक्षय ज्ञान निधि का प्रयोग कर नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने पर बल दिया।
विषय विशेषज्ञ प्रो. आर.पी. तिवारी ने कहा कि प्राचीन भारतीय ज्ञान को पाश्चात्य देशों ने परिवर्तित रूप में प्रस्तुत किया, जिससे हम सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ते चले गए। उन्होंने भूगोल विद्वानों से नवीन शिक्षा पद्धति में प्राचीन ज्ञान-विज्ञान का समावेश करने की अपील की। प्रो. अल्पना त्रिवेदी ने बताया कि भारतीय ज्ञान कभी केवल पुस्तकीय नहीं रहा, बल्कि मौखिक और परंपराओं के माध्यम से संचरित हुआ।
केंद्रीय अध्ययन मंडल की अध्यक्ष प्रो. कुसुम माथुर ने द्वितीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए स्नातक द्वितीय व तृतीय वर्ष के भूगोल प्राध्यापकों के साथ पाठ्यक्रम की रूपरेखा तैयार की। कार्यशाला संयोजक एवं नोडल अधिकारी डॉ. मोहन निमोले ने अतिथियों का परिचय, स्वागत और कार्यशाला के उद्देश्य की रूपरेखा प्रस्तुत की।
कार्यक्रम की शुरुआत भारतीय ज्ञान परंपरा का निर्वाह करते हुए माँ सरस्वती की पूजा और गायत्री मंत्र उच्चारण से हुई। सम्राट विक्रमादित्य की मूर्ति पर पुष्प माला अर्पित कर अतिथियों का स्वागत किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रभाकर मिश्र ने किया और आभार डॉ. गणेश राठौर ने व्यक्त किया।
इस अवसर पर 45 से अधिक प्राध्यापक एवं शोधार्थी उपस्थित रहे, जिनमें डॉ. अर्चना पुरोहित, डॉ. राखी शुक्ला, मेजर डॉ. संजय सोहनी, डॉ. डी.पी. चतुर्वेदी, डॉ. आर.आर. गोराश्या, डॉ. रवि मिश्र, डॉ. एम.एल. बड्गोत्या, डॉ. आर.पी. यादव, डॉ. जगदीश कनोजे, डॉ. आशोक रावत, डॉ. मेकुसिंह निगवाल, डॉ. राजेश महौर, प्रो. कैलाश मुजाल्दा, डॉ. किरण मंडलोई, डॉ. प्रमिला बघेल और प्रो. विक्रम सोलंकी प्रमुख रूप से शामिल थे।
कार्यशाला में भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और भूगोल विषय में नवाचार के साथ समृद्ध पाठ्यक्रम निर्माण पर विस्तृत चर्चा की गई।
