अधूरी चाय, अधूरा इश्क़
चाय को ना नहीं बोलते साहब, पाप लगता है…” — और इस मासूम से वाक्य ने मोहित की ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। वर्षों बाद जब वही चाय की खुशबू और वही बात एक नन्हीं बच्ची ने दोहराई, तो अधूरी कहानी को एक नया अंत मिल गया।

चाय को ना नहीं बोलते साहब, पाप लगता है…” — और इस मासूम से वाक्य ने मोहित की ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। वर्षों बाद जब वही चाय की खुशबू और वही बात एक नन्हीं बच्ची ने दोहराई, तो अधूरी कहानी को एक नया अंत मिल गया।
एक वास्तुविद् जब घर के वास्तुदोष की तलाश में पहुँचते हैं, तो उन्हें वहाँ कुछ ऐसा दिखाई देता है जो किसी भी वास्तु-नियम से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है—परिवार का प्रेम, सम्मान और आपसी मेल।
सविता सिंह मीरा, प्रसिद्ध कवयित्री, जमशेदपुर संस्कार, सदाचार,विचार, आचार —तू ही मेरा श्रृंगार। अलंकार, उपहार,आकार, निराकार —सब तेरे ही हैं प्रकार। नदी, पोखर, ताल, तलैया,तू ही सबकी खेवईया।शाखा, वल्लरी, द्रुम, लता,प्रकृति की सुंदर छटा।वर्षा, ओस, बादल, घटा,खग, मृग, बाल गोपाल,राम, केशव, नंदलाल। धूप, छाँव, अंबर, धरा —यह सब तो तेरे हैं रूप।तू ना हो तो…
पितृपक्ष में कौओं को भोजन कराने की परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यह पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, पारिवारिक संस्कारों, करुणा और जीव-जंतुओं की देखभाल का संदेश भी देती है। जानिए इस सदियों पुरानी परंपरा के पीछे छिपे सांस्कृतिक और मानवीय अर्थ।
कविता महिलाओं के अक्सर अनदेखे संघर्षों को उजागर करती है, जो हर रस्म, हर बंधन और त्यौहार निभाती हैं, फिर भी खुद की खुशियों और अपनी देखभाल के लिए समय नहीं निकाल पातीं। सुबह की भागदौड़, बच्चों को तैयार करना, टिफ़िन बनाना और घर के काम निपटाना—इन सब में वह अक्सर अपने आप को आइने में देखना भूल जाती हैं। पति, सास-ससुर और परिवार की जिम्मेदारियों को संभालते हुए हर छोटी-बड़ी बात पर ध्यान देती हैं, पर अपने लिए समय नहीं निकाल पातीं। बिंदी, पायल, झुमके और पल्लू संवारना—सब पीछे रह जाता है। बीमार होने पर भी उन्हें ताने और कई मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह कविता महिलाओं की अद्भुत सहनशीलता, उनके कर्तव्यों के प्रति समर्पण और रोज़मर्रा के जीवन में किए जाने वाले भावनात्मक परिश्रम को दर्शाती है, जो अक्सर अनदेखा रह जाता है।
अकेलेपन और मार्गदर्शन की खोज का भावपूर्ण वर्णन है। लेखक अपने जीवन में उस पल का अनुभव कर रहा है जब न खुद की दिशा स्पष्ट है, न किसी और का ठिकाना। वह मंजिल और साथी की तलाश में अकेले खड़ा है, उम्मीद करता है कि कोई आए और उसे नए मार्ग की ओर ले जाए। यह एक आत्मान्वेषण और साथी की आवश्यकता की कविता है, जो जीवन में खोए हुए मार्ग और मिलने वाली नई मंजिल की प्रतीक्षा को उजागर करती है।
नारी केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और राष्ट्र के निर्माण में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्राचीन काल से ही सीता, गार्गी, सावित्री और अपाला जैसी नारियों ने अपनी बुद्धिमत्ता और साहस से समाज को नई दिशा दी। मध्यकाल में रानी लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई होल्कर और बेगम हजरत महल जैसी वीरांगनाओं ने अपने साहस से यह सिद्ध किया कि नारी किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं।
आधुनिक युग में भी नारी ने हर क्षेत्र—विज्ञान, राजनीति, कला, खेल और व्यापार—में सफलता के झंडे गाड़े हैं। कल्पना चावला, किरण बेदी, सुनीता विलियम्स और मैरी कॉम जैसी प्रेरणादायी महिलाएँ इसका प्रमाण हैं।
बिट्ट जैन सना, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई काम आई न दिल्लगी दिल की।ये कभी क्या हुई किसी दिल की। इश्क़ वालों के साथ ही अक्सर।ज़ेह्न से दुश्मनी हुई दिल की। आशिक़ी में है सिर्फ़ आह-ओ-फ़ुग़ाँ,कब हुई किसको आगही दिल की। दिल हमेशा जवान रहता है,उम्र बढ़ती नहीं कभी दिल की। आज उस दिलरुबा को देखा तो,ख़ुद-ब-ख़ुद…
“सब की भूख का हिसाब रखने वाले, अपनी भूख को कैसे दबा कर रख पाते होंगे?”
यह पंक्ति डिब्बे वालों के जीवन की मार्मिक विडंबना को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ दर्शाती है — वे जो दूसरों की भूख मिटाते थे, स्वयं भूखे रह गए।