Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

एक दिवाली बचपन वाली…

वो दिवाली, जिसमें दीपक छोटे थे, पर हमारी खुशियाँ बहुत बड़ी। जिसमें घर की सफाई भी खेल थी, और कबाड़ में से गुम चीज़ मिल जाना किसी खजाने से कम नहीं। जिसमें पटाखों की आवाज़ें नहीं… हमारी हँसी की गूँज ज़्यादा थी।जिसमें मिठाईयों की खुशबू थी, और त्योहारों में सजे संस्कार। वो दिवाली… जो परंपरा के साथ हमारी मासूमियत को भी रोशन कर देती थी।

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रोटी की दास्तान

एक पिता जिसने बच्चों के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी, वही बुढ़ापे में भावनात्मक उपेक्षा का शिकार हो जाता है। “रोटी की दास्तान” रिश्तों की सच्चाई को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।

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रात में खाली बिस्तर और रहस्यमयी माहौल, लड़की के गायब होने का सस्पेंस दृश्य

अब क्या होगा…?

“रीता ने दरवाज़े की दोनों कुंडियाँ कसकर बंद कर दीं।आज उसने ठान लिया था—सच जानकर ही रहेगी। आधी रात को जब उसकी आँख खुली,
तो उसने घबराकर शेफाली के बिस्तर की ओर देखा…बिस्तर फिर से खाली था।रीता की सांसें थम-सी गईं दरवाज़ा तो अंदर से बंद था…तो आखिर शेफाली गई कहाँ?”

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“शाम के धुंधले माहौल में अकेला शख्स इश्क़ के ख्यालों में डूबा हुआ”

इब्तिदा-ए-इश्क

इश्क़ एक ऐसा एहसास है जो शब्दों से परे होते हुए भी कविता में सबसे खूबसूरत ढंग से व्यक्त होता है। “इब्तिदा-ए-इश्क” इसी एहसास की एक झलक है, जहाँ अधूरापन भी एक मुकम्मल कहानी का हिस्सा बन जाता है।

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दो पुराने भारतीय मित्र वर्षों बाद मुस्कुराते हुए गले मिलते हुए, जो सच्ची दोस्ती, विश्वास और अटूट रिश्ते की भावनाओं को दर्शाते हैं।

दोस्ती

दूरी चाहे कितनी भी हो, सच्ची दोस्ती कभी कम नहीं होती। यह कविता दो दोस्तों के बीच विश्वास, अपनापन, रूठने-मनाने और जीवनभर साथ निभाने के खूबसूरत रिश्ते को शब्द देती है।

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महिला काव्य मंच लखनऊ इकाई की काव्य गोष्ठी संपन्न

महिला सशक्तिकरण एवं साहित्य साधना को समर्पित महिला काव्य मंच (मध्य) की लखनऊ इकाई द्वारा मासिक काव्य गोष्ठी का सफल ऑनलाइन आयोजन दिनांक 29 अगस्त 2025 को किया गया.
इस साहित्यिक आयोजन की मुख्य अतिथि रहीं डॉ. स्वदेश मल्होत्रा (अध्यक्ष, महिला काव्य मंच, अयोध्या) तथा विशिष्ट अतिथि रहीं डॉ. गीता मिश्रा. कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. राजेश कुमारी (राष्ट्रीय अध्यक्ष, शिक्षा मंच) के प्रस्तावना भाषण से हुआ. उन्होंने अपनी अध्यक्षीय उद्बोधन में मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए महिला काव्य मंच के उद्देश्यों और साहित्यिक गतिविधियों की सार्थकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने लखनऊ इकाई की सक्रियता और निरंतरता की सराहना करते हुए सभी कवयित्रियों को बधाई भी दी.

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रात में तेज़ रोशनी से भ्रमित होकर काँच की खिड़कियों से टकराते पक्षियों को देखता एक बुज़ुर्ग व्यक्ति।

पल भर शेष

रात के सन्नाटे में एक बुज़ुर्ग पिता भयभीत होकर अपने दिवंगत बेटे को पुकारते हैं। उन्हें दिखाई देता है कि कृत्रिम रोशनी से भ्रमित होकर दुनिया भर के पक्षी उनके कमरे की ओर टूटे चले आ रहे हैं। यह केवल एक सपना नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ हमारे बढ़ते असंतुलन और प्रकाश प्रदूषण की भयावह चेतावनी है। संवेदनाओं, पर्यावरण और मानवीय रिश्तों को छूती यह कहानी पाठक को अंत तक बाँधे रखती है।

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एक उदास महिला खिड़की के पास बैठी है, आंखों में आँसू, हाथ में पुरानी चिट्ठी, धुंधली रोशनी में प्रेम और विरह की भावना झलकती हुई।

इश्क़ की इंतहा

राँची, झारखंड की कवयित्री अर्पणा सिंह की यह मार्मिक ग़ज़ल प्रेम, विरह, तड़प और आत्मिक समर्पण की गहराइयों को उजागर करती है। “ज़िंदगी में तुम नहीं तो ज़िंदगी कुछ भी नहीं” पंक्ति के माध्यम से प्रेम की पूर्णता और विरह की पीड़ा का संवेदनशील चित्रण किया गया है।

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जरा जरा तू हमसे मिल कविता

जरा-ज़रा तू हमसे मिल

जरा जरा तू हमसे मिल, तनिक तनिक उतर मेरे दिल…” यह कविता प्रेम के उन कोमल एहसासों को छूती है, जहाँ शब्द कम और नजरों की भाषा ज़्यादा बोलती है। मिलन की चाह, दिल की तड़प और अनकहे जज़्बातों को बेहद खूबसूरती से पिरोती यह रचना पाठक के मन में एक मधुर रोमांटिक लहर जगा देती है।

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बारिश में खिड़की के पास खड़ी एक युवती, हाथ में सूखा गुलाब लिए दूर क्षितिज की ओर देखती हुई। उसके चेहरे पर बिछड़ने की पीड़ा और पुरानी यादों की गहरी भावनाएँ झलक रही हैं।

…कि मुझे सब याद है

कुछ रिश्ते भले ही जीवन से चले जाएँ, लेकिन उनकी यादें हमेशा साथ रहती हैं। यह कविता बिछड़ने के बाद भी दिल में बसे प्रेम, अधूरी मुलाकातों, बारिश की स्मृतियों और अनकहे एहसासों को बेहद संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है।

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