gulmohar

सौ सुनार की, एक लोहार की !

जब समाज सवाल करता है, तब एक माँ का विश्वास ही बेटी की सबसे बड़ी ताकत बनता है। तानों और वर्जनाओं के बीच पली उम्मीदें जब मुकाम तक पहुँचती हैं, तो हर बंद उँगली अपने आप हट जाती है और सपने इतिहास बन जाते हैं।

Read More
रेगिस्तान में खड़ी एक लड़की के पीछे नागफनी का पौधा, समाज में बेटियों के दर्द का प्रतीकात्मक दृश्य

नागफनी सी बेटियां !

यह कविता बेटियों के प्रति समाज में मौजूद भेदभाव और उपेक्षा की मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत करती है। नागफनी के प्रतीक के माध्यम से दिखाया गया है कि प्रेम और स्वीकार्यता से वंचित लड़कियां भीतर से कोमल होते हुए भी परिस्थितियों के कारण कठोर बन जाती हैं।

Read More

खुद को निहारना भूल गई वो..

कविता महिलाओं के अक्सर अनदेखे संघर्षों को उजागर करती है, जो हर रस्म, हर बंधन और त्यौहार निभाती हैं, फिर भी खुद की खुशियों और अपनी देखभाल के लिए समय नहीं निकाल पातीं। सुबह की भागदौड़, बच्चों को तैयार करना, टिफ़िन बनाना और घर के काम निपटाना—इन सब में वह अक्सर अपने आप को आइने में देखना भूल जाती हैं। पति, सास-ससुर और परिवार की जिम्मेदारियों को संभालते हुए हर छोटी-बड़ी बात पर ध्यान देती हैं, पर अपने लिए समय नहीं निकाल पातीं। बिंदी, पायल, झुमके और पल्लू संवारना—सब पीछे रह जाता है। बीमार होने पर भी उन्हें ताने और कई मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह कविता महिलाओं की अद्भुत सहनशीलता, उनके कर्तव्यों के प्रति समर्पण और रोज़मर्रा के जीवन में किए जाने वाले भावनात्मक परिश्रम को दर्शाती है, जो अक्सर अनदेखा रह जाता है।

Read More
कहा अनकहा सुना अनसुना कविता के लिए मौन और अनकही भावनाओं का दृश्य

कहा अनकहा, सुना अनसुना

कभी मन बहुत कुछ कहना चाहता है, लेकिन परिस्थितियाँ उसे मौन रहने पर मजबूर कर देती हैं। ‘कहा अनकहा, सुना अनसुना’ इसी मौन, दूरी और अनकही भावनाओं की अभिव्यक्ति है।

Read More
Realistic scene of a tired young woman sitting alone in a dim, cluttered room during rain, with wet clothes hanging, cats nearby, and a phone on the floor showing missed calls, expressing guilt and emotional heaviness, with a blurred train visible outside the window.

छूटी हुई फोन कॉल्स के संकट …

यह रचना एक छूटी हुई कॉल के बहाने मनुष्य के भीतर छिपे अपराधबोध, थकान और रिश्तों की अनकही दूरियों को उजागर करती है। रोज़मर्रा की भागदौड़, शारीरिक पीड़ा और मानसिक उलझनों के बीच छूटे छोटे-छोटे क्षण किस तरह गहरे पछतावे में बदल जाते हैं, यही इसका केंद्र है। एक साधारण-सी छूटी कॉल यहाँ जीवन के बड़े संकट, टूटते संबंधों और भीतर की असुरक्षा का प्रतीक बन जाती है।

Read More

रणक्षेत्र में गूंजे सत्य के शाश्वत शब्द

गीता शब्द को सुनते ही मन में जिज्ञासा आना स्वाभाविक है की इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी। भगवान कृष्ण को अपने अलौकिक रूप में आकर रणक्षेत्र के बीच उपदेश देने की आवश्यकता क्यों पड़ी।कहते है उस समय रणक्षेत्र का दृश्य था की एक तरफ कौरवों की सेना दूसरी तरफ पांडवो की सेना थी और अपने ही परिवार जानो को दिख अर्जुन विचलित हो जाते है।

Read More

एक कतरा प्यार

वह मुझसे नहीं, मेरे वजूद के सिर्फ एक छोटे से अंश से प्यार कर बैठा। उसे शायद अंदाज़ा भी नहीं कि मेरे बाकी हिस्सों में कितनी कहानियाँ, कितने घाव और कितनी चुप्पियाँ दबी पड़ी हैं। मेरी हँसी के पीछे छुपे आँसू, मेरे सुकून के पीछे की बेचैनी, और मेरी तन्हाइयों के पीछे की चीखें ये सब उसकी समझ से बहुत दूर हैं।

Read More

ज्ञान का कलित वर्णन

यह कविता ज्ञान को रूप, रस, शब्द, अनुभव और विवेक के समग्र स्वरूप में प्रस्तुत करती है। बालक के ‘क, ख, ग’ से लेकर विद्वान की विरासत तक ज्ञान को जीवन, संघर्ष, विनम्रता और सहानुभूति की निरंतर यात्रा के रूप में रेखांकित करती है।

Read More
आत्मचिंतन और करुणा के भावों से भरी एक भारतीय महिला की प्रतीकात्मक छवि, जो सृजन और संवेदना का संदेश दे रही है।

जननी से जगजननी तक

आज के परिवेश में कुछ नारियाँ भी भयावह कांड करने वाली हो गई हैं। विविध अशोभनीय, असंवेदनशील और निर्दयी घटनाओं को देखकर हृदय द्रवित हो उठता है। पर ऐसा होने के पीछे दशकों से नारी पर किए गए अत्याचारों का परिणाम भी कहा जा सकता है, जिसके कारण वह असहनशील और संवेदनाहीन होकर जघन्य अपराध कर रही हैं। पर संभलना तो होगा उन नारी रूपों को, जो ऐसे कृत्य कर रही हैं।

क्योंकि, हे नारी! तू ही तो सृष्टि की आधारशिला है। यदि तू ही अपने जन्मे बच्चों को खा जाएगी, तो यह सृष्टि आगे कैसे बढ़ेगी? सृष्टि ही समाप्त हो जाएगी, क्योंकि तू ही तो जननहारी है। इन्हीं भावों को निम्न कविता में समेटने का प्रयास किया है नारी को चैतन्य करने के लिए….

Read More

इंसानियत…

मुंबई बाढ़ का वो दिन मेरे लिए हमेशा के लिए यादगार बन गया. दोपहर बारह बजे से शाम पांच बजे तक मैं कुर्ला और सायन के बीच फँसी रही, फिर भी घर पहुँचने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे थे.
ट्रेन में बैठते ही लगा कि यह तो आम बरसात है, क्योंकि ट्रेन सामान्य गति से चल रही थी. लेकिन विद्याविहार के बाद जैसे ही ट्रेन रुकी, परेशानियाँ शुरू हो गईं. कुर्ला पहुँचने में आधा घंटा लग गया और वहाँ से थोड़ी देर चलकर ट्रेन फिर आऊटर पर रुक गई और बस वहीं अटक गई.
घड़ी के काँटे घूमते रहे, एक… दो… तीन… चार… पाँच बज गए. बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी.
कंपार्टमेंट में पहले तो सब सामान्य थे, किसी को अंदाज़ा नहीं था कि परेशानी इतनी लंबी खिंच सकती है. धीरे-धीरे लोगों ने घर और ऑफिस में खबर दे दी कि ट्रेन में फँसे हैं, देर हो सकती है.

Read More