सिंहस्थ 2028 में उज्जैन पहुंचने से पहले रोकी जाएंगी ट्रेनें, रेलवे की नई रणनीति

सिंहस्थ 2028: उज्जैन स्टेशन से पहले रोकी जाएंगी ट्रेनें

आगामी सिंहस्थ 2028 को लेकर रेलवे ने अपनी रणनीति स्पष्ट कर दी है। इस बार फोकस केवल इंफ्रास्ट्रक्चर पर नहीं, बल्कि भीड़ नियंत्रण और यात्री प्रबंधन पर है। इसी के तहत उज्जैन मुख्य स्टेशन पर दबाव कम करने के लिए ट्रेनों को शहर के बाहर ही रोकने की योजना बनाई गई है।

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छोटे कस्बे में रात के मेले में लगी नाटक कंपनी का मंच, रोशनी, भीड़ और डांस परफॉर्मेंस का जीवंत दृश्य

1 रुपये की टिकट, हज़ारों यादें..

महिदपुर रोड के टंकी चौराहे पर, नाटक कंपनी की रौनक हर साल एक अलग ही दुनिया बुनती थी। 1 रुपये की टिकट पर रात का एक शो जहाँ नाटक के बीच में डांसर अपनी नृत्य कला से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती। दर्शक नोट ऊपर उठाकर सम्मान देते, डांसर की नज़रें जैसे जवाब देतीं, और कोई कलाकार तुरंत नोट उठाकर ले जाता। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं था, यह उस ज़माने की मासूमियत, उत्साह और जीवंत संस्कृति का हिस्सा था

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संत महामंडलेश्वर अभिराम दास जी त्यागी का दिव्य आगमन

डॉ प्रेरणा मनाना, पूर्व निदेशक आरडी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग, लेखिका स्तंभकार इंदौर- भारतीय संत परंपरा के महानतम व्यक्तित्वों में से एक, संत महामंडलेश्वर अभिराम दास जी त्यागी, बुधवार को हमारे निवास स्थान पधारे। उनके आगमन से पूरा वातावरण दिव्यता, शांतिपूर्ण ऊर्जा और सकारात्मकता से भर गया। संत श्री अभिराम दास जी त्यागी न केवल एक…

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माँ विंध्यवासिनी की सुंदर प्रतिमा, लाल चुनरी और स्वर्ण आभूषणों से सजी हुई, नवरात्रि पूजा का दृश्य

विंध्यवासिनी माता

विंध्यवासिनी माता को समर्पित यह भक्ति कविता भक्तों की आस्था, श्रद्धा और समर्पण को दर्शाती है। इसमें माता के श्रृंगार, छप्पन भोग, नवरात्रि उत्सव और भक्तों की भावनाओं का सुंदर चित्रण किया गया है। यह कविता नवरात्रि के पावन अवसर पर पढ़ने योग्य एक उत्कृष्ट रचना है।

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पुरानी यादों की साउंडट्रैक: ऑडियो कैसेट का जादू

सन 1990 का दशक, जब घरों में टीवी और वीसीआर थे, और मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन कैसेटें थीं। फ़िल्में घर पर किराए पर लेकर देखी जातीं ऋषि कपूर और शाहरुख़ की दीवाना या संजय दत्त और माधुरी की साजन और फिर कैसेट लौटाई जाती। देबु की छोटी दुकान, पाकिस्तानी स्टेज प्ले की हास्य कैसेटें, ऑडियो कैसेट की अपनी आवाज़ और गली में बच्चों का टीवी देखने का मज़ाये सब उस समय की यादों का हिस्सा थे। धीरे-धीरे केबल टीवी और डिजिटल तकनीक ने कैसेट का दौर समाप्त कर दिया, लेकिन उस समय का अपनापन और इंतज़ार आज भी यादों में जीवित है।

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मैं हिंदी बोल रही हूँ

हिंदी ने वर्षों से भारतीय संस्कृति, साहित्य और जनजीवन में गहरी जड़ें जमा रखी हैं। यह अपने देश में राजभाषा के रूप में पूर्ण सम्मान की आकांक्षा रखती है। विदेशी विश्वविद्यालयों और विश्व हिंदी सम्मेलनों में इसका सम्मान है, मगर अपने देश में इसे संवैधानिक रूप से राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया गया। यह पाठ हिंदी के गौरव, संघर्ष और उसके महत्व को बखूबी उजागर करता है।

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 पुणे में  ‘उगम’ संगीत कार्यक्रम17 अगस्त को

प्रसिद्ध हारमोनियम वादक तन्मय देवचके की स्वरानुजा संगीत अकादमी की और से रविवार, 17 अगस्त 2025 को ‘उगम’ कार्यक्रम का चौथा संस्करण आयोजित किया जाएगा । यह कार्यक्रम तिलक रोड के न्यू इंग्लिश स्कूल के गणेश हॉल में सुबह 10 बजे से शुरू होगा। कार्यक्रम सभी के लिए निःशुल्क रहेगा और पहले आने वाले रसिकों को प्राधान्य इस आधार पर कार्यक्रम के लिए प्रवेश दिया जायेगा। कुछ सीटें आमंत्रितों के लिए आरक्षित रहेंगी।
इस कार्यक्रम में तन्मय देवचके के दुनिया भर के छात्रों की विशेष प्रस्तुतियाँ होंगी, जो अपनी हारमोनियम कौशल का प्रदर्शन करेंगे। तन्मय देवचके के वरिष्ठ छात्र निलय साळवी और अथर्व कुलकर्णी तबले पर अनीश थत्ते के साथ एकल हारमोनियम वादन करेंगे।

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मध्य रेल ने ‘ट्रेन ऑन डिमांड’ सेवाएँ शुरू कीं

– त्योहारों, ग्रीष्म व शीतकालीन अवकाश के दौरान यात्रियों की बढ़ती मांग को देखते हुए मध्य रेल ने विभिन्न प्रमुख गंतव्यों के लिए “ट्रेन ऑन डिमांड” विशेष ट्रेनों का संचालन शुरू कर दिया है। इन ट्रेनों को यात्रियों की सुविधा को प्राथमिकता देते हुए नागपुर, मडगाँव, बेंगलुरु, हजरत निजामुद्दीन, हैदराबाद, गोरखपुर, हावड़ा, सियालदह और बिलासपुर जैसे शहरों के बीच चलाया जा रहा है, जिससे राज्यों के बीच तेज़, आरामदायक और निर्बाध यात्रा सुनिश्चित हो सके।

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एक नीली सी नदी..

बरसों के अंतराल में, उस समय तुम बिना किसी रोक-टोक के प्रेम में डूबे थे, और मैं भी उसी प्रेम में भीग रही थी। तुम्हें नीला रंग पसंद था, और मैं नीलम की तरह दमक रही थी। हमारे शब्द एक मधुर लय में बह रहे थे, जैसे दो प्रेमी अपने सपनों के गीत गा रहे हों। मैं प्रेम की नदी बनी थी, और तुम, पुरुष, बांध बनाने के लिए पत्थर चुनने लगे। हमारे गीत उन पत्थरों से टकरा कर शब्द बनाते रहे, फिर धीरे-धीरे बिखर गए। तुम लगातार बरसते रहे, और मैं सूख गई।
सुनो पुरुष, प्रेम के घर बांधों से नहीं बनते, ये बहती नदी के नावों पर बनते हैं। व्यस्त हाथों के बावजूद, उस सूखी जमीन के भीतर अब भी एक नीली-सी नदी बह रही है। क्योंकि प्रेम में खो जाना भी प्रेम में होना ही माना जाता है।

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