अब बात नहीं करोगे…

उस दिन उसने कहा-“अब बात नहीं करोगे।”
शब्द ठंडे थे, पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। मैं मुस्कुरा दी और कह दिया-“मैं भी बात नहीं करूँगी।”
वास्तव में, हमने पहले ही बातचीत खो दी थी। मैं हर रोज़ उसके पास बैठकर कुछ पल चाहती थी. बस सुनना, समझना, साथ में रहना। लेकिन वह हमेशा जवाब देता रहा, पर कभी वास्तव में मौजूद नहीं था। महँगे तोहफ़े, बड़े रेस्टोरेंट, दिखावटी सुख, कुछ भी मेरे भीतर के खालीपन को भर नहीं सका।

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आदर, मंच और धोखा

“एक दिन अचानक सरला के खाते में साढ़े तीन लाख रुपये आ जाते हैं। कोई जानकारी नहीं, कोई सूचना नहीं। थोड़ी ही देर में एक फोन आता है—‘मैं रामभरोस बोल रहा हूं, मेरी बहू से गलती से आपके खाते में पैसे आ गए हैं, लौटा दीजिए।’ सरला चौंक जाती है। क्या यह कोई साजिश है या ईमानदारी? चेक लौटाया जाता है। लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकती। वह आदमी बार-बार घर आने लगता है—कभी चाय पर, कभी मोहल्ले में गाड़ी खड़ी करने के बहाने। उसके शब्दों में ‘मिशन’, ‘समाजसेवा’ और ‘फायदा’ की मीठी-मीठी बातें होती हैं।

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जीना इसी का नाम है..

क्या जीवन में सहज हो जाना वास्तव में इतना आसान होता है? क्या गिरकर, रोकर चुप हो जाना सरल होता है? कुछ पाकर उसे खो देना, कठिन समय में भी मजबूत बने रहना — यह सब आसान नहीं होता। खासकर एक स्त्री के लिए, जो सही होते हुए भी चुपचाप गलत सुनी जाती है, मूक रह जाती है। फिर भी, स्त्रियाँ यह सब सहती हैं, चोट खाकर भी मुस्कुराना सीख जाती हैं। उनके लिए जीना बस यूँ ही गुनगुनाते हुए आगे बढ़ते रहना है, क्योंकि असल में — जीना इसी का नाम है।

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ऐ वक्त कुछ पल ठहर जा…

ऐ वक्त, ज़रा ठहर तो सही। सदियों से मन में पलते प्रश्न तेरी तेज़ रफ़्तार के कारण अनकहे रह जाते हैं। मैं पूछना चाहती हूँ—कहाँ खो गई वह दुनिया, जहाँ हरियाली और खुशहाली थी, जहाँ पशु-पक्षियों तक में प्रेम और उल्लास था। सूरज की किरणों में वात्सल्य झलकता था, चाँदनी में प्रीत का अहसास बिखरा रहता था।

आज सब कुछ बदल गया है। इंसान इंसान का दुश्मन बन बैठा है, भावनाएँ सूख गई हैं, हमदर्दी लुप्त हो गई है और खुदगर्जी ही राज कर रही है। न मौसम ठीक है, न प्रकृति। हरियाली मिट रही है, खुशहाली खो रही है। इंसानियत बिन मौत ही मर रही है।

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जीवन एक संघर्ष है…

जीवन एक संघर्ष है” में जीवन की कठिनाइयों और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच संघर्ष की अनिवार्यता को व्यक्त किया गया है। लेखक बताते हैं कि केवल साँस लेना जीवन नहीं है; जीवन का सार संघर्ष, जिजीविषा और प्रकृति के साथ सामंजस्य में है। प्रेम, सौंदर्य, आनंद, विरह और मिलन—सबका संतुलन संघर्ष के माध्यम से ही मिलता है। यह कविता यह संदेश देती है कि अतीत, वर्तमान और भविष्य—सभी में संघर्ष ही जीवन की असली कहानी है। जीत और हार से परे, संघर्ष ही हमें सशक्त बनाता है और जीवन को सार्थक बनाता है।

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बड़की

संयुक्त परिवार की रसोई सिर्फ़ खाना पकाने की जगह नहीं होती, वहाँ रिश्तों की आँच भी सुलगती है।
सुनीता को आज समझ आया कि कमाना ही पर्याप्त नहीं, घर के कामों में हाथ बँटाना भी उतना ही ज़रूरी है। बड़ी भाभी ललिता की चुप्पी में शिकायत नहीं, थकान छिपी थी उस जिम्मेदारी की जो उन्होंने बरसों से बिना शोर उठाई थी। कभी-कभी रिश्तों में तकरार इसलिए नहीं होती कि कोई गलत है, बल्कि इसलिए कि कोई दूसरे की थकान देख नहीं पाता।

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मैं तुम्हें सोचता रहता हूँ…

यह कहानी प्रतीक्षा के उस नाज़ुक क्षण की दास्तान है, जहाँ प्रेम शब्दों से पहले मौन में पलता है। किताबों, कॉफी-हाउस और बारिश में भीगे स्वीकार के बीच, एक स्त्री वर्षों तक एक वाक्य के सहारे जीती रहती है—“I am well thinking of you always.” यह केवल स्वीकार नहीं, बल्कि संकोच, भय और आत्म-संयम को पार कर प्रेम को आवाज़ देने की कथा है।

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क्या मर्द कभी रोते हैं?

“नहीं, कभी नहीं।”“कभी नहीं?”“नहीं, कभी नहीं।”“सच में, कभी नहीं?”“हाँ, सच में कभी नहीं रोते।” हाँ, सच में मर्द कभी नहीं रोते… कहते-कहते आँखों से आँसू छलक पड़े, और उन छलकते हुए आँसुओं में रवानी कब आ गई, पता ही नहीं चला… मुझे नहीं पता कि मर्द पहली बार कब रोया!क्या जब खुदा ने आदम को…

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धारा और संकल्प

कंकड़ और पत्थरों ने मिलकर नदी की दिशा मोड़ने का संकल्प लिया। उन्होंने उसके प्रवाह को रोकने के लिए बाँध बनाए, टीले खड़े किए और पहाड़ बनने का सपना देखा। लेकिन नदी – जो स्वयं प्रवाह की देवी है – न रुकी, न झुकी। वह ठोकरें खाती रही, पर हर बाधा के पार एक नया मार्ग खोजती रही। अपनी गति को कभी न छोड़ते हुए, उसने प्यासों को जल, खेतों को हरियाली और जीवन को उम्मीद दी। अंततः, जब सारे पत्थर थक गए और टीले मिट्टी बन गए, नदी अपनी मंज़िल — समुद्र — तक पहुँच गई। उसने सिद्ध किया कि उसे रोका जा सकता है थोड़ी देर के लिए, पर हमेशा के लिए नहीं। क्योंकि उसका अस्तित्व ही बहते रहने में है।

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