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जीवन के विभिन्न भावनात्मक रंगों को दर्शाता होली का दृश्य

रंगों से सजी ज़िंदगी

विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद रंग ज़िंदगी को खूबसूरत बनाते हैं।जीवन में हर रंग अपनी अहमियत दर्ज कराने समय-समय पर चला आता है। अमूमन हम नीले, पीले, हरे और सबसे पुराने रंगगुलाबी के बारे में जानते हैं। रंग ज़िंदगी में हों या शब्दों में… वे खुद को बयां कर ही देते हैं। आइए जानते हैं,…

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विकास की नई इबारत लिख रहीं सरपंच ऋतु पाटीदार

सरपंच ऋतु पाटीदार और उनके प्रतिनिधि सत्यनारायण पाटीदार के नेतृत्व में शिवाजीनगर में विकास कार्यों को नई दिशा मिली है। पारदर्शिता, जनसुनवाई और प्रभावी कार्यशैली के कारण पंचायत की कार्यप्रणाली मजबूत हुई है।

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गली में हाथ-ठेला लगाए कलई वाला, भट्टी के पास रखे पीतल के बर्तन और आसपास खड़े उत्सुक बच्चे

इतनी-सी खुशी!

“कलई करा लो…” की पुकार के साथ शुरू होती थी बचपन की हलचल। पीतल के बर्तनों की चमक, भट्टी की आँच और राँगे की खुशबू के बीच छिपी थीं मासूम खुशियाँ। यह संस्मरण केवल कलई की प्रक्रिया का वर्णन नहीं, बल्कि उस दौर की सादगी, पारिवारिक आत्मीयता और छोटी-छोटी बातों में मिलने वाली अपार खुशी की झलक है। आज की चकाचौंध भरी दुनिया में वे दिन याद बनकर मन को भिगो जाते हैं।

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मोबाइल फोन में व्यस्त परिवार के सदस्य, एक ही घर में अलग-अलग कमरों में स्क्रीन देखते हुए लोग

रिश्ते ऑनलाइन, एहसास ऑफलाइन

आजकल रिश्ते घरों में कम और मोबाइल स्क्रीन पर ज़्यादा दिखाई देते हैं। दोस्त, नाते-रिश्तेदार और पड़ोसी सब डिजिटल दुनिया में सक्रिय हैं, जबकि वास्तविक जीवन में दूरी बढ़ती जा रही है। यह व्यंग्यात्मक लेख सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय और आभासी संबंधों के माध्यम से आधुनिक समाज की विडंबना को उजागर करता है। लेख यह प्रश्न उठाता है कि क्या वाकई डिजिटल दुनिया उतनी ही रोचक है जितनी दिखती है?

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जयपुर में आयोजित ब्रज रसिया होली कार्यक्रम में राधा-कृष्ण प्रस्तुति और रंगों के बीच नृत्य करते कलाकार

जयपुर में गूंजा “ब्रज रसिया”-होली के रंग.. कृष्णा के संग”

जयपुर में राजस्थान ब्रज भाषा अकादमी एवं सम्पर्क संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “ब्रज रसिया – होली के रंग… कृष्णा के संग” कार्यक्रम में ब्रज संस्कृति की जीवंत झलक देखने को मिली। चार घंटे तक चले इस आयोजन में राधा-कृष्ण प्रस्तुति, फाग गीत, नृत्य और काव्य प्रतियोगिताओं ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का उद्देश्य युवा पीढ़ी को ब्रज भाषा और सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ना रहा।

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होली के अवसर पर रंगों से खेलते लोग, गुलाल और अबीर उड़ाते हुए, आत्मीयता और प्रेम का दृश्य

होली : आत्मीयता का पर्व

होली भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख रंगोत्सव है, जो फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, सौहार्द और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। होलिका-दहन असत्य और अहंकार के अंत का संदेश देता है, जबकि रंगों की होली आपसी आत्मीयता को मजबूत करती है। यह पर्व हमें जीवन के विविध रंगों को स्वीकार कर प्रेम और सद्भाव के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

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मुंबई मराठी पत्रकार संघ में आर के ओपन माइक ‘उत्सव शब्दों का’ कार्यक्रम में मंच पर प्रस्तुति देते प्रतिभागी और उपस्थित साहित्यकार

मुंबई में सजा ‘उत्सव शब्दों का’

आर के पब्लिकेशन द्वारा मुंबई मराठी पत्रकार संघ में आयोजित ‘उत्सव शब्दों का’ ओपन माइक कार्यक्रम में 50 से अधिक प्रतिभागियों ने हिंदी, मराठी, अंग्रेजी और अवधी भाषाओं में शानदार प्रस्तुतियाँ दीं। तीन सत्रों में विभाजित इस आयोजन में देश के विभिन्न हिस्सों से आए साहित्यकारों और निर्णायकों की गरिमामयी उपस्थिति रही।

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डायरी पर लिखी हिंदी ग़ज़ल के पन्नों पर गिरते आँसू, रात की हल्की रोशनी में भावुक माहौल

आँसुओं का हिसाब रखे ज़माना हुआ…

यह ग़ज़ल इश्क़ की तड़प, जज़्बातों के छल और सत्ता की विडंबना को एक साथ समेटती है। शमा, परवाना, कफ़न और मयखाने जैसे प्रतीकों के माध्यम से कवि ने दर्द और दौर-ए-वक़्त का सटीक चित्र खींचा है।

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मैं कहीं भी नहीं थी: स्त्री अस्तित्व और पहचान पर मार्मिक कविता

मैं कहीं भी नहीं थी…

यह कविता एक ऐसी स्त्री की आवाज़ है जो हर जगह मौजूद होते हुए भी कहीं दर्ज नहीं थी। यह उसकी पहचान, उसकी अनसुनी चीख और उसके जीवित रहने के अधिकार की मार्मिक अभिव्यक्ति है।

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