टूटते रिश्ते, बढ़ती हिंसा
“यह हिंसा अचानक नहीं होती, बल्कि वर्षों से जमा हो रही पीड़ा और असंतोष का विस्फोट होती है…
एक अस्वस्थ रिश्ते में जीते हुए हर दिन मरने से बेहतर है, उसे अलविदा कहना।”

“यह हिंसा अचानक नहीं होती, बल्कि वर्षों से जमा हो रही पीड़ा और असंतोष का विस्फोट होती है…
एक अस्वस्थ रिश्ते में जीते हुए हर दिन मरने से बेहतर है, उसे अलविदा कहना।”
एक अरसा बीत गया उससे मिले हुए, लेकिन वह हर पल, हर सांस में किसी अनकही बातचीत की तरह मौजूद रहा। उसकी उपस्थिति इतनी गहरी थी कि शब्दों को रोकने की कोशिश के बावजूद, आँखें सब कुछ कह गईं। जीवन और मृत्यु के बीच का फर्क भी जैसे धुंधला पड़ गया जो खो गया, वही भीतर कहीं जीवित हो उठा।
वह केवल एक स्त्री नहीं, बल्कि अनगिनत रूपों का संगम है दर्द को आँखों में समेटे हुए भी अडिग खड़ी। वह चौखट की मर्यादा भी है और जीवन की हर जिम्मेदारी का आधार भी। कभी दुर्गा बनकर शक्ति का प्रतीक बनती है, तो कभी मीरा बनकर भक्ति में विलीन हो जाती है। उसके भीतर द्रौपदी की प्रतिज्ञा है, पद्मिनी का त्याग है और झांसी की रानी सा साहस भी। वह मौन रहकर भी बहुत कुछ कहती है, सहनशीलता में भी आग समेटे रहती है। वही मां है, वही बेटी और उसी से इस संसार की हर कहानी, हर रिश्ते और हर अस्तित्व की शुरुआत होती है।
“अरे काकी, तुम्हें नहीं मालूम क्या? बंसी का बेटा कलेक्टर बन गया है…” संध्या की बात सुनते ही जानकी काकी की आँखों में चमक आ गई। दिन-रात ऑटो चलाकर बेटे को पढ़ाने वाले बंसी की तपस्या आज रंग लाई थी। जब मीडिया ने बेटे से उसकी सफलता का श्रेय पूछा, तो उसने बिना झिझक कहा—“मेरे बाउजी… क्योंकि फल की पहचान हमेशा पेड़ से ही होती है।” यह सुनकर बंसी की आँखों से आँसू बह निकले, और आसपास खड़ी भीड़ तालियों से गूंज उठी। यह सिर्फ एक सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उस संघर्ष, त्याग और प्रेम का प्रमाण है, जो एक पिता अपने बच्चे के लिए जीता है।
रुचि अग्रवाल की यह प्रेरक कहानी बताती है कि कैसे एक गृहिणी ने जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों को जिंदा रखा और लेखन, वीडियो क्रिएशन व वॉइस ओवर के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनाई। सिलीगुड़ी की निवासी रुचि आज एक सफल लेखिका हैं, जिनकी पुस्तक “बातें कुछ अनकही सी” प्रकाशित हो चुकी है और वे 25 से अधिक एंथोलॉजी का हिस्सा हैं। यह कहानी हर महिला के लिए प्रेरणा है जो अपनी पहचान बनाना चाहती है।
देहरादून की शांत वादियों से उठी एक आवाज़ आज समाज की सोच को चुनौती दे रही है. यह कहानी है लक्ष्मी कीभारत की पहली सर्टिफाइड दृष्टि दिव्यांग (विजुअली इम्पेयर्ड) रेडियो जॉकी, जिन्होंने न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि समाज के स्थापित पूर्वाग्रहों को भी तोड़ने का साहस दिखाया.
“मुझे मिल गया मन का मीत” एक भावपूर्ण हिंदी कविता है, जिसमें प्रेम, भक्ति और आत्मसमर्पण की गहराई को सुंदर शब्दों में व्यक्त किया गया है। यह कविता एक ऐसे मिलन की अनुभूति कराती है, जहाँ मन को सच्चा साथी मिलता है और जीवन संगीत से भर उठता है। नारी-मन की संवेदनाओं, प्रतीक्षा और पूर्णता का यह काव्यात्मक चित्रण पाठकों को भाव-विभोर कर देता है।
साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है, पर आज यह स्त्री-मन की गहराइयों का भी प्रतिबिंब बन चुका है। ‘अवनि से अंबर तक’ में सुप्रसन्ना जी ने नारी के अंतर्द्वंद्व, पीड़ा, मातृत्व और आत्मबोध को अत्यंत संवेदनशीलता से उकेरा है। उनकी कविताएँ कभी मुस्कान बनकर खिलती हैं, तो कभी वेदना बनकर हृदय को भिगो देती हैं। यह काव्य-संकलन न केवल स्त्री-अस्तित्व की खोज है, बल्कि समाज की बदलती संवेदनाओं का सजीव दस्तावेज भी है।
10वीं पास होने के बावजूद खुद को इसरो वैज्ञानिक बताकर मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर फर्जी प्रोफाइल बनाकर एक महिला से 26 लाख रुपये की ठगी करने वाले आरोपी को येरवडा पुलिस ने गिरफ्तार किया है. उसने इसी प्रकार से महिलाओं से ठगी के 11 मामले किए हैं.
आदर्श प्रशांत म्हात्रे उर्फ स्वप्नील वारुळे उर्फ हेमंत गायकर उर्फ जयेश पाटिल (उम्र 34, निवासी अलीबाग, जिला रायगढ़) ऐसा इस आरोपी का नाम है. उसे कैसीनो का शौक है और वह गोवा के एक कैसीनो का गोल्ड कार्ड सदस्य है. ठगी के 21 लाख रुपये उसने इसी कैसीनो के खाते में जमा किए थे. येरवडा पुलिस ने यह 21 लाख रुपये जब्त कर लिए हैं.