एक पाती मुसाफ़िर के नाम…

विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद

जाने से पहले एक आख़िरी मुलाक़ात, जो मैं करना चाहती थी…
वह सड़क, जिस पर कदम बातों की धुन पर थिरकते थे।
वो बारिश की बूँदें, जो किसी एहसास की तरह छू जाती थीं।
वो तपती धूप, जो गरम होने के बावजूद कभी गरम लगी ही नहीं।

वो हर मौसम, जिसका मज़ा हमने कदमों के साथ लिया और भीतर तक महसूस किया।
वो पल जिन पलों में साथ-साथ हमारे लबों पर हँसी आई और कभी-कभी ठहाकों ने लोगों को घूरने पर मजबूर कर दिया,
तो कभी बहते आँसुओं को सबसे छुपा लिया आँखों में सिर्फ़ नमी लाकर।

जब-जब साथ गुज़रे,
वह हर पल…
वह एक-एक पत्ती…
वह हर फूल, हर डाली, हर पेड़
सब साक्षी बने हमारी बातों के।

हमारे हर राज़ सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हें ही पता हैं,
क्योंकि वे ही तो शामिल थे,
हमारे साथ बहती हवा की तरह,
जो स्पर्श बनकर हम दोनों को छू जाती थी, एक एहसास की तरह।

चलते-चलते गिरे हुए शहतूत उठाकर खा लेना,
या पेड़ से अमरूद तोड़कर खाना…
और तुम्हारे पूछने पर
“क्या खा रही हो?”
और जवाब में मेरा कहना-“अमरूद”
खाने का स्वाद और बढ़ा देता था।

शहतूत और जामुन का खट्टापन
मीठी बातों के साथ बहुत मीठा लगता था।

मेरे दिन और रात बदल दिए थे तुमने।
सुबह और शाम के मायने भी बदल गए थे।
सुबह कुछ ज़्यादा ही सुनहरी,
और शाम कुछ ज़्यादा ही मस्ती-भरी हो गई थी।

सारे जज़्बात सिर्फ़ उन लम्हों में सिमट गए थे,
जिनमें हमारी बातें होती थीं।
यूँ तो एहसासों को लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं होती,
फिर भी हर वक़्त हमें बेसब्री से इंतज़ार रहता था
एक-दूसरे के शब्दों को और ज़्यादा पढ़ने का,
समझने का…

क्योंकि वे सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं होते थे,
वे दिल में धड़कन बनकर धड़कते थे।
वे आईना थे, जो हमें हमारा हाल बताते थे।
पर आईना भी कहाँ पूरा सच बता पाया,
थोड़ी-सी बेईमानी उसने भी की।

मैं जानती हूँ…
अब हम नहीं लौटेंगे।
किन्तु क्या, जब-जब हम पुकारेंगे,
उन सदाओं को सुन पाएँगे हम?

सब कुछ छोड़कर एक नई दुनिया बसा ली थी
उस दुनिया को क्या कभी भूल पाएँगे हम?

वह जज़्बात जो कहे नहीं गए,
वह आँसू जो बहे नहीं,
उन बातों को क्या कभी दोहरा पाएँगे हम?

गलतफ़हमी का एक पत्थर हमारी नींव हिला गया,
फिर नई इमारत क्या कभी बना पाएँगे हम?

बंजारों-से फिरते रहते हैं, खुद से ही पूछते हैं
अब नए सफ़र की शुरुआत क्या कभी कर पाएँगे हम?

वह वक़्त, जो हमने एक-दूसरे को दिया
वह हमारा वक़्त
क्या कभी एक-दूसरे को लौटा पाएँगे हम?

जवाब दोनों ही जानते हैं,
पर चुप्पी की दीवार
चुपचाप कब खड़ी हुई और इतनी बड़ी हो गई
कि अब तोड़ नहीं पाएँगे हम।

क्योंकि यह दीवार हमने ख़ुद खड़ी की है,
और इंसान अपनी बनाई चीज़ों को
बहुत शिद्दत से संभालता है
वही कर रहे हैं हम।

सुनना चाहो तो सुन लो…
लौटाना चाहो तो लौटा दो…
बस इतना ही…

One thought on “एक पाती मुसाफ़िर के नाम…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *