“मोहल्ले में पुलिस के आने पर इकट्ठा भीड़ और हैरान पड़ोसी, हास्यपूर्ण स्थिति”

किरायेदार

यह एक हास्यपूर्ण कहानी है जिसमें पड़ोसन फोन पर सुनी अधूरी बात के आधार पर खून का शक कर पुलिस बुला लेती है, लेकिन अंत में सच्चाई सामने आने पर पूरा मामला मजाक बन जाता है।

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एक पाती मुसाफ़िर के नाम…

जाने से पहले की वह आख़िरी मुलाक़ात जहाँ मौसम, सड़कें, पेड़ और खामोशी तक हमारी बातों के साक्षी बने। मीठी यादों, अनकहे जज़्बातों और एक गलतफ़हमी के बीच खड़ी चुप्पी की दीवार, जो आज भी लौटने से रोकती है।

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पूर्वाग्रह

इवा की साइकिल गायब थी और रोती हुई बच्ची बार-बार पूछ रही थी.“मम्मा, किसने ली?”
मनोरमा को तुरंत शक उसी कचरा उठाने वाले मनोज पर गया, जिसने कुछ दिन पहले साइकिल मांगने की बात कही थी। शिकायत पर मनोज को सामने लाकर खड़ा किया गया, वह केवल इतना बोल सका. “मैडम, मैंने नहीं ली… CCTV देख लीजिए।” उसी समय अरविंद का फोन आया और सच सामने आ गया.साइकिल तो उन्होंने ही मरम्मत के लिए भेजी थी।.मनोरमा के भीतर अपराधबोध भर गया. शक उसका था, गलती उसका पूर्वाग्रह।

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