
विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद
भरे बाज़ार में मैं पसीने से तरबतर हो रही थी, परंतु मुझे सब्ज़ियाँ सब्ज़ी मंडी से ही खरीदने में मज़ा आता था। एक तो सब्ज़ी बेचने वालों से पुराना परिचय, दूसरा हर सब्ज़ी को सहला कर, टटोलकर लेना, इसमें सभी औरतें पारंगत होती हैं। जैसे भिंडी की नोक दबाकर देखना टूट गई तो कच्ची, वरना पक्की। टमाटरों का कड़ापन, रंग और आकार के साथ मेल बैठाना। पत्ता-गोभी, बैंगन आदि तो फटाफट रंग देखकर ले लिए जाते हैं, पर फूलगोभी तो अंदर तक ताँक-झाँक करके ही ली जाती है। बेचारी सब्ज़ियों को भी कितनी परीक्षाओं के दौर से गुजरना पड़ता है।
फिर इतना ही नहीं जो पसंद आ गई, वह कुनबे से बिछड़कर हमारी बास्केट में और फिर किचन की शोभा बन जाती है। कुछ बेचारियाँ अपने पकने का इंतज़ार करते-करते बिना चूल्हे के ही पक जाती हैं, जिन्हें न तो चूल्हे की गर्मी मिलती है और न ही किसी की तारीफ़। बेचारी सीधे डस्टबिन में पहुँच जाती हैं बिना किसी इस्तेमाल के।
हम बचपन में जब ताऊजी के साथ सब्ज़ी मंडी जाते थे, तभी से सब्ज़ियों से हमारी अच्छी मित्रता हो गई थी, जो उम्र के साथ और बढ़ती चली गई। सबके रंग-रूप से स्वाद और जायका मुँह में घुल जाता। कुछ कंटीली, कुछ कसैली पर सब अपने-अपने विशेष गुणधर्म समेटे हुए। इन सबका राजा आलू—वह तो सबके साथ मिलकर अपनी हुकूमत चलाता रहता। बचपन में हमारे घर में भी आलू का ही राज रहा। शाम को रोज़ एक सब्ज़ी आलू की रसे वाली कम्पल्सरी बनती थी। तब लोग इतने हेल्थ कॉन्शियस नहीं थे, न।
हमने अपने ज़माने में सब्ज़ियों से मित्रता की। आज ऑनलाइन का ज़माना है घर बैठे सब्ज़ियाँ आ जाती हैं। कुछ बहुत पकी हुई होती हैं, कुछ समझ में नहीं आतीं, फिर भी मँगवा ली जाती हैं। अब सब्ज़ियों को न वह स्पर्श मिलता है, न ही वह स्नेह।
हमें याद है, हमारे घर में आलू बोरी भर-भरकर आते थे, जिन्हें धोकर, सुखाकर बड़े प्रेम से रखा जाता था। साथ ही बाकी सब्ज़ियाँ भी बहुत मात्रा में आती थीं, क्योंकि तीन भाइयों का परिवार साथ में था। आज परिवार सिमट गए हैं और सब्ज़ियाँ भी।
हमें याद है, हम सारे बच्चे कच्ची सब्ज़ियाँ खूब खाते थे और बड़ों की बातें भी सुनते थे “काम के न काज के, ढाई सेर अनाज के।” मगर उसमें उनका प्यार हमें दिखता था और हम खुशी-खुशी सब्ज़ियाँ लेकर भाग जाया करते थे। मटर, मूली, गाजर, ककड़ी, जामुन, बेर, करौंदे, आँवला सब सीज़नल सब्ज़ियाँ और सीज़नल फल। कभी हमें गैस की शिकायत नहीं हुई।
हमारी दादी हमारे लिए कई सब्ज़ियाँ और फल छुपाकर रखती थीं कि यह इस बच्चे को दूँगी, यह उस बच्चे को दूँगी। और हम सारे बच्चे मिल-बाँटकर सब खाते, खेलते और बातों का मज़ा लेते। तब हम हेल्थ कॉन्शियस नहीं थे, न।
आज सब हेल्थ कॉन्शियस हो गए हैं। क्या वाकई? हेल्थ के साथ-साथ क्या बाकी बातों में भी कॉन्शियस हो गए हैं जैसे संवेदना, अनुभूति, अभिव्यक्ति और प्यार के रिश्ते? हम भी उस वक्त इन सब चीज़ों के प्रति कॉन्शियस थे इन्हें टूटने से बचाने और निभाने में। आजकल भी सब इनके प्रति कॉन्शियस हैं, पर बनाने और निभाने में नहीं।
आज रिश्ते-नाते भी सब्ज़ियों की तरह टटोले जाते हैं और समय के साथ बासी होकर डस्टबिन के कगार तक पहुँच जाते हैं। इसलिए रिश्तों को सहेजना बहुत ज़रूरी है। प्यार की बूँदों से धोकर रिश्तों को ताउम्र ताज़ा रखा जा सकता है।

बहुत बढ़िया विजया जी । अब सब्जियों को न वह स्पर्श मिलता है ना वह स्नेह
और सब्जियों को भी कितनी परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है ।
बेहतरीन लाईनें