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रिश्तों की अहमियत समझो, डस्टबिन में मत डालो

सब्ज़ियों की मंडी से शुरू हुई यह स्मृतियों की यात्रा रिश्तों तक पहुँचती है, जहाँ लेखक अतीत और वर्तमान की तुलना करते हुए बताता है कि जैसे सब्ज़ियाँ बासी होकर फेंक दी जाती हैं, वैसे ही आज रिश्ते भी संवेदना के अभाव में डस्टबिन तक पहुँच जाते हैं।

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सोना

प्रसव के बाद थकी-हारी गीतू मायके से किसी के आने की उम्मीद लगाए चिंतित है। आर्थिक तंगी और दूरी के कारण उसे लगता है कि कोई नहीं आएगा। मन में यह भी कसक है कि काश बेटी होती तो पिता का बोझ हल्का होता। तभी सासू माँ फोन पर सबको खुशी से बेटे के जन्म की खबर देती हैं और मालिशवाली को बुलाकर कहती हैं — सवा महीने बाद बड़ा फंक्शन होगा। गीतू अपनी चिंता बताती है कि मायके से सोना-चांदी आदि कैसे आएंगे, तो सास lovingly कहती हैं — “सोना-चांदी तो दादा-दादी की ओर से आएगा, तुमने हमें पोते के रूप में खरा सोना दिया है।” यह सुनकर गीतू भावुक होकर अपनी सास से लिपट जाती है अपनी दूसरी माँ की तरह।

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