भरोसे की डोर
क्या प्रेम में किसी को खो देने का डर जरूरी है? राघव और रिद्धिमा की कहानी बताती है कि रिश्ते केवल वादों से नहीं, बल्कि ईमानदारी, संवाद, सम्मान और भरोसे से मजबूत बनते हैं।

क्या प्रेम में किसी को खो देने का डर जरूरी है? राघव और रिद्धिमा की कहानी बताती है कि रिश्ते केवल वादों से नहीं, बल्कि ईमानदारी, संवाद, सम्मान और भरोसे से मजबूत बनते हैं।
तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में आगे बढ़ते हुए विनोद ने सफलता तो पा ली, लेकिन रिश्तों को समय देना भूल गया। करवाचौथ के दिन एक गजरा उसे एहसास दिला देता है कि प्यार बड़ी चीज़ों में नहीं, बल्कि उन छोटे पलों में छिपा होता है जिन्हें वह हमेशा टालता रहा। जब समझ आया, तब बहुत देर हो चुकी थी।
सब्ज़ियों की मंडी से शुरू हुई यह स्मृतियों की यात्रा रिश्तों तक पहुँचती है, जहाँ लेखक अतीत और वर्तमान की तुलना करते हुए बताता है कि जैसे सब्ज़ियाँ बासी होकर फेंक दी जाती हैं, वैसे ही आज रिश्ते भी संवेदना के अभाव में डस्टबिन तक पहुँच जाते हैं।
जिस प्रकार जीवन के लिए श्वास लेना आवश्यक है, उसी प्रकार रिश्तों को जीवित रखने के लिए विश्वास की आवश्यकता होती है। यदि रिश्तों में शक, झूठ और अवसाद जैसी अशुद्ध वायु भर जाए, तो उनका दम घुटने लगता है। ऐसे में जरूरी है कि हम स्वयं सकारात्मक रहें और अपने रिश्तों को विश्वास की स्वच्छ हवा प्रदान करें, क्योंकि इन्हें बचाने की ज़िम्मेदारी हमारी ही है – किसी और की नहीं।