“न कॉल, न मैसेज, न कोई वजह… आखिर क्यों रिश्तों में बढ़ रहा है घोस्टिंग का चलन ?”

एक युवा व्यक्ति मोबाइल फोन देखते हुए भावनात्मक तनाव में, रिश्ते में घोस्टिंग और डिजिटल दूरी को दर्शाता दृश्य। डिजिटल दौर में रिश्तों में बढ़ती खामोशी और घोस्टिंग की समस्या।

सुरेश परिहार, पुणे

आज के डिजिटल दौर में रिश्ते बनाना जितना आसान हो गया है, उन्हें निभाना और खत्म करना भी उतना ही बदल गया है. सोशल मीडिया, डेटिंग ऐप्स और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म ने लोगों को करीब लाने के नए रास्ते खोले हैं, लेकिन इन्हीं माध्यमों ने रिश्तों में एक नई समस्या को भी जन्म दिया है- घोस्टिंग
घोस्टिंग आज की युवा पीढ़ी के बीच चर्चा का एक लोकप्रिय शब्द है. इसका अर्थ हैजब कोई व्यक्ति बिना किसी कारण बताए अचानक बातचीत बंद कर दे, फोन उठाना बंद कर दे, संदेशों का जवाब न दे और बिना किसी स्पष्टीकरण के रिश्ते से दूरी बना ले. सामने वाला व्यक्ति इंतजार करता रह जाता है. शायद कोई जवाब आएगा, शायद कोई वजह बताएगा, शायद कोई गलती समझ में आएगी. लेकिन कई बार दूसरी तरफ सिर्फ खामोशी होती है.
घोस्टिंग सिर्फ आज की समस्या नहीं
घोस्टिंग शब्द भले ही नया है, लेकिन यह व्यवहार नया नहीं है. पुरानी पीढ़ी के समय में भी लोग अचानक रिश्तों से दूरी बना लेते थे. फर्क सिर्फ इतना था कि तब इसे घोस्टिंग नहीं कहा जाता था. उस समय लोग इसे बात बंद कर देना, मुँह फेर लेना, किनारा कर लेना, रिश्ता खत्म कर देना जैसे शब्दों से समझते थे. जब मोबाइल फोन और सोशल मीडिया नहीं थे, तब संपर्क के साधन सीमित थे. प्रेम संबंधों में पत्रों का दौर था. अगर कोई व्यक्ति पत्रों का जवाब देना बंद कर देता था, मिलने से बचने लगता था या अचानक संपर्क खत्म कर देता था, तो सामने वाला धीरे-धीरे समझ जाता था कि रिश्ता शायद खत्म हो चुका है.यानी इंसानी व्यवहार वही था, बस माध्यम बदल गए हैं.
पहले और आज में क्या बदला?
पहले किसी रिश्ते से दूरी बनाना आसान नहीं था. लोगों के बीच सामाजिक जुड़ाव अधिक था. एक-दूसरे के परिवारों और दोस्तों को जानकारी होती थी. इसलिए रिश्ता खत्म करने से पहले बातचीत और स्पष्टीकरण की संभावना अधिक रहती थी. आज डिजिटल दुनिया ने दूरी बनाना बेहद आसान कर दिया है. एक क्लिक में नंबर ब्लॉक किया जा सकता है. सोशल मीडिया पर अनफॉलो किया जा सकता है. ऑनलाइन रहते हुए भी किसी संदेश को अनदेखा किया जा सकता है. तकनीक ने संपर्क बढ़ाया है, लेकिन कई बार संवाद की गहराई कम कर दी है. घोस्टिंग का असर सिर्फ दिल पर नहीं, दिमाग पर भी पड़ता है
किसी रिश्ते का अचानक खत्म होना व्यक्ति को भावनात्मक रूप से परेशान कर सकता है. सबसे बड़ी परेशानी यह होती है कि सामने वाले को कोई जवाब नहीं मिलता. वह बार-बार सोचता है.आखिर मेरी गलती क्या थी?क्या मैंने कुछ गलत कहा या किया? वह अचानक क्यों बदल गया? यह सवाल धीरे-धीरे तनाव और चिंता को बढ़ा सकते हैं.घोस्टिंग का शिकार व्यक्ति कई बार खुद को दोष देने लगता है. उसे लगता है कि शायद उसमें कोई कमी थी. इससे उसका आत्मविश्वास प्रभावित हो सकता है. इसके अलावा बिना किसी निष्कर्ष के खत्म हुआ रिश्ता मन में अधूरापन छोड़ जाता है. व्यक्ति आगे बढ़ने में कठिनाई महसूस कर सकता है.जब कोई करीबी व्यक्ति अचानक दूर चला जाता है, तो खालीपन महसूस होना स्वाभाविक है.
क्या घोस्टिंग से बचा जा सकता है?
हर रिश्ता हमेशा नहीं चलता. कई बार अलग होना जरूरी भी होता है. लेकिन रिश्ते खत्म करने का तरीका व्यक्ति के संस्कार और संवेदनशीलता को दिखाता है.अगर किसी रिश्ते में आगे बढ़ना संभव नहीं है, तो एक ईमानदार बातचीत कई चोटों को कम कर सकती है.घोस्टिंग का सामना कर रहे लोगों के लिए कुछ बातें मददगार हो सकती हैं जैसे-खुद को पूरी तरह दोषी न मानें.अपनी भावनाओं को किसी भरोसेमंद दोस्त या परिवार के सदस्य से साझा करें.खुद को अकेला न करें.अपनी दिनचर्या, काम और रुचियों पर ध्यान दें.याद रखें कि किसी का चले जाना आपकी पूरी पहचान तय नहीं करता.आज की तेज रफ्तार जिंदगी में लोग कई बार मुश्किल बातचीत से बचने के लिए खामोशी का रास्ता चुन लेते हैं. लेकिन किसी को बिना जवाब दिए छोड़ देना उसके लिए भावनात्मक बोझ बन सकता है.
रिश्ते बनाना खूबसूरत है, लेकिन उन्हें सम्मान के साथ निभाना उससे भी ज्यादा जरूरी है. आखिरकार, घोस्टिंग नया शब्द जरूर है, लेकिन इंसानी व्यवहार पुराना है. पहले लोग चुपचाप दूर हो जाते थे, आज डिजिटल दुनिया में गायब हो जाते हैं. रिश्ते खत्म हो सकते हैं, रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन संवाद और सम्मान कभी खत्म नहीं होना चाहिए.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *