
सविता सिंह मीरा,जमशेदपुर
शब्दों के चंद्र थे प्रेमचंद,
हर कथा में जन-जन से अनुबंध।
संवेदना की किरणों से दमके,
साहित्य-नभ के भानु बन चमके।
हामीद की सादगी में मुस्कान,
होरी के सपनों का अवसान।
हल्कू की ठिठुरती हर रात,
‘कफ़न’ में जीवन के जज़्बात।
भूखे मन की व्यथा लिखी,
आँसू की हर कथा लिखी।
जब-जब मानवता रोई थी,
प्रेमचंद की कलम ही बोली थी।
‘निर्मला’ की मौन व्यथा,
‘गबन’ में मानव मन की कथा।
हर रचना में जन की पीड़ा,
अन्याय के विरुद्ध लड़ी क्रीड़ा।
कलम बनी निर्धन की आवाज़,
सत्य रहा उनका अनुपम साज़।
कहते थे”जिस दिन कुछ न लिखूँ मैं,
उस दिन रोटी का अधिकारी नहीं मैं।”
शब्द नहीं, वे दीप जलाते,
सोए हुए विवेक जगाते।
युगों-युगों तक अमर रहेगा,
प्रेमचंद का साहित्य-सवेरा।
ऐसे युगद्रष्टा साहित्य-ऋषि को,
मानवता के अमर उपासक को।
भाव-सुमन अर्पित बारंबार,
शत-शत नमन, शत-शत नमस्कार।
