
डॉ. मधु आंधीवाल
रमन बहुत देर से मीता को खिड़की के पास खड़ा हुआ देख रहा था। मीता को नहीं पता था कि रमन आ चुका है। वह बाहर पड़ोसी काकी के घर में होने वाले हंगामे को देख रही थी। काकी का संयुक्त परिवार था। सावन का महीना शुरू होने का मतलब सब ननद और बेटियों का जमघट जुड़ना। जब से शादी होकर इस घर में आई, तभी से वह देखती आ रही थी। ससुराल में वह अकेली थी। सास-ससुर, पति और वह। भाग्यवश उसके भी कोई संतान नहीं थी। मायके में सब थे।
सोचते-सोचते पता ना कब अपनी जिंदगी के उन पलों में पहुँच गई। गुजरे पल स्वर्णिम पल थे उसकी जिंदगी के। उसका संयुक्त परिवार था। दादी-दादा, काका-काकी, बुआ, उसकी बड़ी दो बहनें, दो भाई, काका की दो बेटियाँ और एक बेटा। वह दादी की परी थी। सब बच्चे दादी से लड़ते थे कि मीता ही तुम्हें प्यारी है। सावन के महीने में दादी आँगन में झूला डाल देती थी और उस पर छोटा खटोला अटका देती। सब भाई-बहन उस पर लद जाते थे। जैसे-जैसे सब बड़े हो रहे थे, उतने ही शरारती हो रहे थे। बुआ की शादी हो गई। सब बच्चे खूब रोए। बुआ की जान थे सब बच्चे। पहला सावन था शादी के बाद बुआ का। पापा और काका दोनों बुआ की विदाई कराने गए, पर आते समय कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई और पापा, काका, बुआ तीनों की विदाई हो गई। जब घर में पता लगा तो हाहाकार मच गया। दादा और दादी का बुरा हाल था। समय बीत रहा था। जिस सावन में माँ-काकी हरियाली तीजों पर सोलह शृंगार करती थीं, वहाँ सफेद लिबास में आ गईं। इस गम को दादा-दादी सहन ना कर पाए और परलोक सिधार गए। सब बहनों की भी शादी हो गई। बस इतना अच्छा था, माँ-काकी का साथ नहीं छूटा। व्यापार भी माँ ने संभाला। अभी पिछले दिनों उसके भाई की शादी भी हो गई। सोच रही थी, पता ना इस नई दुल्हन को हम ननदें पसंद भी होंगी या नहीं।
नमन ने आवाज दी, “मीता, मैं कितनी देर से तुम्हें आवाज दे रहा हूँ। कहाँ खोई हो? तुम्हारी नई भाभी का फोन है।”
मीता ने फोन लेकर कहा, “हलो…”
हाँ भाभी, उधर से आवाज आई, “दीदी, सब दीदी तीजों पर आ रही हैं, राखी तक रुकेंगी। आप कब आ रही हो?”
मीता एकदम बोली, “तुम अपने मायके नहीं जाओगी?”
भाभी ने कहा, “दीदी, अब मेरा ये घर पहले है। मैं आप सब लोगों के साथ झूला झूलूँगी। जब और देवरानी आ जाएगी, मैं तब जाऊँगी अपने मायके।”
दूर कहीं गाना बज रहा था, “अबके बरस भेज भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाय रे…”
बाबुल तो नहीं थे, पर भाई-भाभी ने उस रिक्तता को भर दिया था।
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