
डॉ. शशिकला पटेल, मुंबई
आंधियों में जलते दिए की बात हो तुम,
सूखी ज़मीं पर पहली बरसात हो तुम।
ख़्वाबों में उतरती हुई एक दुआ हो जैसे,
दर्द में भी मुस्कराते जज़्बात हो तुम।
रात के सन्नाटे में कोई साज़ हो तुम,
थके हुए दिल का मीठा-सा अंदाज़ हो तुम।
टूटते हौसलों में उम्मीद की लौ हो जैसे,
मेरे अरमानों की खूबसूरत शुरुआत हो तुम।
थाम लो तो राहें आसान हो जाएँ,
छोड़ दो तो मंज़िलें वीरान हो जाएँ।
मेरी दास्तान का हसीं मोड़ हो जैसे,
इस सफ़र की अनमोल सौगात हो तुम।
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अनमोल सौगात हो तुम

बहुत सुंदर भाव के साथ लिखा है , पढ़कर बहुत अच्छा लगा