
रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
भारतीय सनातन परंपरा में सुबह और शाम दिया-बत्ती (दीपक जलाना) केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा, अनुशासन और आध्यात्मिक जागरूकता का प्रतीक माना जाता है। लगभग हर घर में वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है। लेकिन आज के समय में लोगों के मन में एक सवाल अक्सर उठता है.क्या सुबह-शाम दिया-बत्ती करना सचमुच ज़रूरी है? यदि किसी दिन दीपक न जलाया जाए, तो क्या भगवान नाराज़ हो जाते हैं?
इस प्रश्न का उत्तर जानने से पहले हमें इस परंपरा के पीछे छिपे वास्तविक अर्थ को समझना होगा।
हिंदू धर्म में दीपक को ज्ञान, आशा और दिव्यता का प्रतीक माना गया है। जब हम सुबह या शाम दीपक जलाते हैं, तो उसका उद्देश्य केवल भगवान की पूजा करना नहीं होता, बल्कि अपने भीतर के अज्ञान, नकारात्मकता और भय को दूर कर सकारात्मक सोच को अपनाना भी होता है। विशेष रूप से संध्या का समय दिन और रात के मिलन का समय माना जाता है। इसलिए इस समय दीपक जलाकर वातावरण में शांति, पवित्रता और सकारात्मकता का भाव उत्पन्न किया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपक की लौ घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है और मन को एकाग्र बनाती है। सुबह दीपक जलाने से दिन की शुरुआत शुभ भावनाओं के साथ होती है, जबकि शाम का दीपक पूरे परिवार को आध्यात्मिक वातावरण में जोड़ने का माध्यम बनता है।
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न-यदि दिया-बत्ती न करें, तो क्या भगवान नाराज़ हो जाते हैं?
सनातन धर्म का मूल संदेश यही है कि भगवान बाहरी दिखावे से अधिक सच्ची श्रद्धा और निर्मल मन को महत्व देते हैं। यदि किसी कारणवश आप किसी दिन दीपक नहीं जला पाए, तो इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान आपसे नाराज़ हो जाएंगे। ईश्वर भाव के भूखे हैं, केवल कर्मकांड के नहीं। यदि आपके मन में श्रद्धा, प्रेम और अच्छे कर्म हैं, तो वही सबसे बड़ी पूजा मानी जाती है।
हालाँकि, यदि कोई व्यक्ति आलस्य, लापरवाही या धार्मिक परंपराओं के प्रति अनादर के कारण नियमित रूप से पूजा-पाठ और दीपक जलाने से दूर रहता है, तो धीरे-धीरे उसका आध्यात्मिक अनुशासन कमजोर हो सकता है। इसका प्रभाव भगवान पर नहीं, बल्कि स्वयं व्यक्ति के मन, विचारों और जीवन पर पड़ता है।
इसलिए सुबह और शाम दिया-बत्ती करना किसी डर या दंड के कारण नहीं, बल्कि आत्मिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सुंदर माध्यम है। यह परंपरा हमें प्रतिदिन कुछ पल अपने भीतर झाँकने, परिवार के साथ जुड़ने और जीवन में प्रकाश बनाए रखने की प्रेरणा देती है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि दीपक की लौ केवल मंदिर को ही नहीं, बल्कि हमारे मन और विचारों को भी प्रकाशित करती है। इसलिए यदि संभव हो, तो प्रतिदिन श्रद्धा और प्रेम से दीपक अवश्य जलाएँ। लेकिन याद रखें. भगवान आपके दीपक की लौ से पहले आपके हृदय की सच्ची भावना को देखते हैं।
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