
दीप्ति अग्रवाल ‘दीप’
चलो चलें अब गाँव, लौट चलते हैं भैया।
राह तके दिन-रात, पिता अरु बूढ़ी मैया।।
सखा, भ्रात सम मीत, छोड़ आए थे हम सब।
सूने हैं खलिहान, कौन देखे उनको अब।।
अपने हैं वे लोग, प्रेम रिश्तों से करते।
थोड़ा भी लें बाँट, खुशी से आँचल भरते।।
रखते हैं विश्वास, दिखावा करें न बिल्कुल।
सुख-दुख में हैं साथ, समय सब काटें मिलजुल।।
पीपल, बरगद, आम, छाँव सुखमय देते हैं।
हवा बनाते शुद्ध, थकन सब हर लेते हैं।।
रख माटी पर पाँव, सहज सुख मिल जाता है।
अपना प्यारा गाँव, हमें कितना भाता है।।
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