गाँव के घर के बाहर प्रतीक्षा करते बुजुर्ग माता-पिता और मिट्टी, पेड़ों व अपनापन से भरा ग्रामीण दृश्य।

चलो चलें अब गाँव

यह कविता गाँव की मिट्टी, रिश्तों की गर्माहट और अपनों के स्नेह की ओर लौटने की भावनात्मक पुकार है। शहर की भागदौड़ में छूट गए गाँव, बूढ़े माता-पिता और सूने खलिहानों की याद मन को बार-बार अपनी जड़ों की ओर खींचती है। कविता बताती है कि गाँव में रिश्ते दिखावे से नहीं, बल्कि विश्वास और प्रेम से निभाए जाते हैं, जहाँ सुख-दुख बाँटकर जीवन जिया जाता है। पीपल, बरगद और आम की छाँव, शुद्ध हवा और मिट्टी का सहज स्पर्श उस आत्मीय सुख का एहसास कराते हैं, जो कहीं और दुर्लभ है।

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कहाँ खो गई यह खूबसूरती..

“महिदपुर रोड का वह स्कूल बगीचा कभी शहर की साँसों का सहारा था। कतारबद्ध वृक्ष मानो ध्यानमग्न तपस्वी की तरह खड़े रहते, पूर्णिमा की रात को झक-सफेद बगुलों और फूलों से लदकर ताजमहल से भी सुंदर दिखते। उन पेड़ों के नीचे की घास पर बैठकर साँझ गुज़ारना, मिट्टी की सौंधी खुश्बू में साँस लेना और सर्दियों में धूप में लगने वाली कक्षा—ये सब जीवन का अनमोल हिस्सा थे। आज वहीं घास की जगह पॉलीथिन है, हरियाली की जगह कचरा और सुना है कि अब वहाँ बस स्टैंड बनेगा। विकास की इस दौड़ में हमने अपनी असली खूबसूरती कहीं पीछे छोड़ दी है।”

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