
विनती झुनझुनवाला, मुंबई
दिन भर की थकन
भूल जाता है,
अपनी संतान को जब
बाहों में उठाता है,
कांधे पर झूलाता है,
उस बाप में भी मुझे
एक माँ नज़र आती है।
नन्हे-नन्हे हाथों से
जब माथा मेरा दबाती है,
जब मेरी चिंता करती है,
तब छोटी-सी गुड़िया मेरी
माँ मेरी बन जाती है।
हर आँसू को पी जाती है,
हँसकर दर्द भी सह जाती है,
वो जब अपने बच्चे को
इस दुनिया में लाती है।
क्या कहूँ उसके लिए यारो,
वो जो एक माँ है,
अपने बच्चे की खातिर
वो कायनात से भी
लड़ जाती है।
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Very nice