लिखते हुए तुम

यह कविता लिखने की प्रक्रिया के भीतर छिपे प्रेम, एकाग्रता और भावनात्मक जुड़ाव को उकेरती है। प्रिय को लिखते हुए देखना, उसकी उँगलियों, कलम और भावनाओं को महसूस करना यह रचना शब्दों से पहले जन्म लेने वाले एहसासों की कथा है।

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बदलते मौसम

यह कविता प्रेम में आए भावनात्मक बदलावों और रिश्ते की अनिश्चितताओं को बेहद कोमलता से व्यक्त करती है. प्रिय के बदलते व्यवहार को कवि बदलते मौसम से जोड़ता है. कविता में प्रेम, असुरक्षा, समर्पण और आपसी ज़रूरत की भावना गहराई से उभरती है. अंत में यह विश्वास व्यक्त होता है कि भले ही मौसम बदले, लेकिन सच्चे रिश्ते स्थिर रहते हैं.

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सच्चा साथी, सच्चा प्रेम

यह भावपूर्ण हिंदी कविता प्रेम, स्नेह और जीवनसाथी के साथ जुड़े भावनात्मक अनुभव को उजागर करती है। इसमें प्यार की गहराई, भरोसा और साथी के साथ जीवन भर निभाए गए रिश्ते की मिठास को सरल और असरदार भाषा में व्यक्त किया गया है।

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कविता और किताब को प्रेम के प्रतीक के रूप में दर्शाता भावनात्मक दृश्य, जिसमें शब्दों के माध्यम से स्नेह और आत्मीयता का एहसास झलकता है

उपहार में शब्द

यह कविता उपहारों से परे शब्दों के स्नेह को महत्व देती है, जहाँ प्रेम फूलों या वस्तुओं में नहीं, बल्कि लिखी और पढ़ी गई कविताओं तथा किताबों के भावनात्मक स्पर्श में बसता है।

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शब्दों में बंधा मेरा दिल

तुम्हारी लिखी हर पंक्ति ने मुझे भीतर तक छू लिया। तुम्हारे शब्दों में गंभीरता और स्त्री‑सम्मान की झलक थी। धीरे‑धीरे तुम्हारा व्यक्तित्व मेरे मन में उतर गया, और अब मुझे लगता है कि मैं तुम्हारी लेखनी की प्रेयसी बन चुकी हूँ। हर रोज़ तुम्हारा लिखा पढ़ना, मेरे लिए एक नयी दुनिया की खोज और प्रेम का अनुभव है।

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ख्यालों में आता रहा…

वह ख्यालों में बार-बार आता रहा कभी याद बनकर सुलाता, कभी कसक बनकर रुलाता। कभी ज़ख़्मों पर मरहम था, तो कभी दिल की आग। साँसों में उसकी महक थी, बारिश की तरह वह बरसता रहा। जब दिल के दरवाज़े खुले, तो वही धड़कन बनकर बस गया। समय बेरहम था, इश्क़ पर परदा रहा और मैं, हर टूटन के बाद भी उसी को महसूस करती रही।

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प्रेम में पहाड़ होना

प्रेम केवल सहज अनुभव नहीं, बल्कि वह पहाड़ की तरह दृढ़ और विशाल भी हो सकता है। यह मन की गहराई से उत्पन्न होता है, तब जब शब्द भी लवों पर आने में संकोच करते हैं। प्रेम में केवल नदी या सागर की तरंगें नहीं, बल्कि वह इतनी शक्ति रखता है कि व्यक्ति पहाड़ बन जाए। यह केवल प्रेमी और प्रेमिका का रिश्ता नहीं है, बल्कि वह पीड़ा को भी अपने साथ बहा ले जाता है, सूर्य के ताप, चाँद की शीतलता, ऋषियों की तपस्या और हवन की अग्नि की तरह विस्तृत और बलिदानी होता है। प्रेम, त्याग और शिव के तांडव की भांति, कभी शांत, कभी उग्र — लेकिन हमेशा अमर और अडिग है।

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तुम “तारा” हो

तुम मेरे आकाशगंगा का तारा हो—जो मेरे ख्वाहिशों के लिए टूटने को तैयार रहती हो, अपनी खुशियों, समय और संसाधनों को बटोरकर भी प्रकाश फैलाती रहती हो। तुम मुझे सपने सच करने का साहस देती हो और सिखाती हो कि दूसरों के लिए भी तारा बनना संभव है।

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किस विध लूँ तेरी थाह

यह कविता एक गहरी, रहस्यपूर्ण और रूमानी अभिव्यक्ति है — प्रेम में डूबे एक हृदय की उस छटपटाहट और जिज्ञासा की, जो अपने प्रिय की भावनाओं, मौन संकेतों और अस्तित्व को पूरी तरह समझना चाहता है। शीर्ष पंक्ति “किस विध लूँ तेरी थाह प्रिय” पूरे काव्य का केंद्रीय भाव है — यह प्रश्न नहीं, एक आकुल जिज्ञासा है, एक समर्पण है।

कविता में प्रिय को एक ऐसी नदी के रूप में देखा गया है, जो सतह पर तो लहराती, मुस्कराती, बलखाती दिखती है, लेकिन भीतर कहीं गहराई में कई सदियों से प्यासेपन की पीड़ा को संजोए हुए है। वह प्रिय किसी दरिया से मिलन नहीं चाहता, फिर भी एक अनकहा प्रवाह है, जो उसे बहाए लिए जाता है — यही वह विरोधाभास है जिसे कवि समझना चाहता है।

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