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रामघाट उज्जैन में हिंदू नववर्ष पर सूर्य को अर्घ्य देते श्रद्धालुओं की भीड़ AI IMAGE

उज्जैन में नववर्ष पर उमड़ा सैलाब, रामघाट पर दिखी आस्था

उज्जैन में हिंदू नववर्ष 2083 की शुरुआत रामघाट पर श्रद्धालुओं की भीड़ और सूर्य अर्घ्य के साथ हुई. चैत्र नवरात्रि के शुभारंभ पर मंदिरों में विशेष पूजा और आयोजन शुरू हो गए हैं.

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1994 के एक भारतीय मोहल्ले की छत पर खड़ी एक किशोर लड़की हाथ में छोटी-सी चिट्ठी लिए शर्माते हुए सामने की छत पर खड़े एक लड़के की ओर देख रही है। दोनों छतों पर सूखते कपड़े, पानी की टंकी और दूरदर्शन के पुराने एंटीना दिखाई दे रहे हैं। ढलते सूरज की सुनहरी रोशनी पूरे दृश्य को मासूम पहली मोहब्बत और पुरानी यादों के भाव से भर रही है।

छत वाला प्रेम

सन् 1994 का वह दौर, जब प्रेम के पास न मोबाइल था, न सोशल मीडिया। बस शाम की छतें, तिरछी निगाहें, पत्थर में बंधी चिट्ठियाँ और एक अधूरी मोहब्बत, जो बरसों बाद भी यादों की छत पर जाड़े की धूप बनकर ठहरी रहती है।

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कीचड़ में खिला कमल का फूल, जो संघर्ष और पवित्र प्रेम का प्रतीक है

कीचड़ का कमल

कीचड़ का कमल” प्रेम और जिम्मेदारियों के बीच फँसी एक स्त्री के अंतर्द्वंद्व को बखूबी उकेरती है। यह कविता बताती है कि हर प्रेम कहानी मुकम्मल नहीं होती कभी परिस्थितियाँ, कभी परिवार और कभी सच का सामना रिश्तों को बदल देता है। यहाँ प्रेम पवित्र है, लेकिन आत्मसम्मान और परिवार की गरिमा उससे भी बड़ा सत्य बनकर उभरते हैं।

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स्त्री

प्रेम में डूबी स्त्री कभी नादान-सी लगती है, कभी इतनी कोमल कि जैसे स्पर्श से बिखर जाए। उसके भीतर सपनों की हलचल है. उमड़ती-घुमड़ती, तितर-बितर होती तमन्नाएँ। वह तितली-सी है, जिसे उड़ना तो है, आसमान को छूना भी है, पर उसके चारों ओर फैली दुनिया उसे फूलों के दायरे से बाहर जाने ही नहीं देती। आसमान ऊँचा है, अपने ही गर्व में अडिग; और ज़मीन पर खड़ी वह स्त्री अपने पंख फैलाने को तैयार होते हुए भी उड़ नहीं पाती।

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नव अंकुर की आस

नवपल्लवित पौधा अपनी कोमल जड़ों से धरती का आशीर्वाद लेकर जीवन की नई शुरुआत करता है। वह नव अंबर और नव भोर के साक्षी के रूप में जन्म लेता है, अपने भीतर जीवन की नयी आस संजोए हुए। चारों ओर फैले उपवन की मधुर सुवास उसे उल्लास से भर देती है। वह अभी शिशु है, पर हर दिन वायु और जल का स्पर्श पाकर बढ़ने की आकांक्षा रखता है।

वह जानता है कि एक दिन वह विशाल वृक्ष बनेगा—जिसकी छाया में संसार विश्राम करेगा, जो अनगिनत जीवों को ऑक्सीजन और जीवनदान देगा। उसका अस्तित्व निःस्वार्थ है, उसका हर अंश किसी न किसी के काम आने वाला है

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भगवान राम का शांत और दिव्य रूप, धनुष-बाण के साथ, चारों ओर प्रकाशमय आभा और आध्यात्मिक वातावरण

घट-घट में बसे हैं राम

हर कण में, हर श्वास में, हर भाव में राम का वास है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि सच्ची शांति बाहर नहीं, बल्कि अपने ही हृदय में बसे राम के स्मरण में है।

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दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर तेज रफ्तार से चलते वाहन, आसपास हरियाली और आधुनिक हाईवे इंफ्रास्ट्रक्चर दिखाई दे रहा है.

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे बना विकास का नया कॉरिडोर

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के शुरू होने से यात्रा समय घटकर 2.5 घंटे रह गया है. यह प्रोजेक्ट उत्तराखंड में पर्यटन और क्षेत्रीय विकास को नई गति देगा.

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बांद्रा टर्मिनस–जयपुर नॉनस्टॉप सुपरफास्ट स्पेशल ट्रेन

यात्रियों की सुविधा और अतिरिक्त भीड़ को समायोजित करने के उद्देश्य से पश्चिम रेलवे बांद्रा टर्मिनस और जयपुर के बीच विशेष किराये पर नॉनस्टॉप सुपरफास्ट स्पेशल ट्रेन चलाएगी.

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मेरा घर कौन-सा…?

यह कविता एक स्त्री की आत्मसंवेदना और उसके भीतर के संघर्ष का मार्मिक चित्रण करती है। वह बताती है कि कैसे समाज और परिवार की परंपराओं के बीच जीते-जीते वह स्वयं अपने ही घर में पराई बन जाती है। मन की पीड़ा इतनी गहरी है कि वह धीरे-धीरे उस “गैरपन” की स्थिति की अभ्यस्त हो जाती है — जैसे किसी ने अपनी पहचान को कुहासे में ब्याह दिया हो।
कविता में “एक धुंध से निकलकर दूसरी धुंध में” जाना, जीवन की निरंतर उलझनों और अस्पष्टताओं का प्रतीक है। वर्जनाओं से घिरी हुई स्त्री फिर भी अपनी “कामनाओं” को निर्बाध बहने देती है, क्योंकि वही उसकी जीवंतता का प्रमाण हैं। अंत में “मेरा घर कौन-सा…?” यह प्रश्न केवल भौतिक घर का नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और आत्मीयता की खोज का प्रतीक बन जाता है। यह कविता स्त्री-मन की उस पीड़ा को उजागर करती है, जो प्रेम, संबंध और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच अपनी पहचान तलाशने का प्रयास कर रही है।

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व्यथा वृक्ष की…

कविता वृक्ष की पीड़ा और धैर्य का जीवंत चित्र खींचती है। गहरी जड़ों वाला यह वृक्ष कई अत्याचार और आघात सहकर भी खड़ा है। उसका कोमल तन और मन भले ही पत्ते-पत्ते, रेशा-रेशा झर गया हो, पर वह पूरी तरह टूटा नहीं। जर्जर होने के बाद भी वह आशा से भरा है कि उसकी शाखाओं पर फिर से नवकोपलें फूटेंगी, हरा-भरा जीवन लौटेगा।
वह स्वयं से प्रश्न करता है कि आखिर उसने क्या ग़लत किया था—सबको आसरा देकर, फल-फूल देकर, उदर-तृप्ति कराकर भी क्यों आहत होना पड़ा? पर साथ ही उसमें यह अटूट विश्वास है कि उसका अस्तित्व ही धरती के जीवन का आधार है। वह मनुष्यों को स्मरण कराता है—यदि वे उसे पोषित करेंगे तो बदले में वह उन्हें संरक्षण देगा।

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