“यमराज की उलझन: अनुपम या अनुपमा?”

वो भैंसा बुरी तरह से थक चुका था , बुरी तरह से हांफ रहा था ! उसके नथुनों से भर्र भर्र की आवाज़ आ रही थी ! हालाकिं वह कोई ऐरागैरा भैंसा नहीं था , वह तो यमराज़ जी का भैंसा था ! एक तो ग्रीष्म काल की गर्मी , ऊपर से यमराज जी की सवारी, ऊपर से अनुपम बर्डे नामक आदमी को पृथ्वी से यमलोग तक लगातार चौथी बार ढोना !

यमराज जी भी खासे परेशान हो चुके थे , पसीने से लथपथ हो रहे थे। माथे पर टेंशन की लकीरें साफ़ साफ़ दिखाई दे रही थी। उनकी परेशानी वाजिब भी थी। अनुपम बर्डे का समय पूरा हो चुका था, उसे यमलोक में लाया जाना था और यह चौथी बार था जब वे नकली अनुपम को उठा लाये थे ! यमराज अलग परेशान और भैंसा अलग !

यमराज जी के सब्र का बांध टूट चुका था , वे थक कर भैंसे के सामने ही पालथी मारकर बैठ गए ! गुस्से में बड़बड़ाने लगे –

” ब्रम्हा जी की नीति मुझे समझ में नहीं आती … यह ठीक किया कि आदमी को विशेष बनाया , जानवरों से अलग बनाया लेकिन उसकी बुद्धि को तो लिमिट में रखना था न … बेहिसाब बुद्धि उँडेल दी … अब खामियाज़ा हम भुगत रहें हैं ! “

भैंसा पसर कर बैठा हुआ था , जुगाली कर रहा था , अपने मालिक के हावभाव को देखकर समझ रहा था कि आज मालिक गुस्से में है।

” ये कम्बख्त आदमी कहाँ से कहाँ पहुँच रहा है ! … हम देवतागण अपने पुराने ढर्रे पर ही अटके हैं , हर एक आदमी का रेकार्ड हम बही खाते में ही कलम से लिख रहें हैं और ये आदमी सारे काम कंप्यूटर पर कर रहा है ! इंटेलिजेंट तो था ही अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंट हो गया ! ये हरामखोर अनुपम , अपने क्लोन्स बना रखा है , ऐसे रोबोर्ट्स बना रखा है जिसका चेहरा मोहरा , आवाज़ हूबहू उसके जैसी है … उसका टाइम ख़त्म हो चुका है , उसे यहाँ लाना है , चार बार हो गया हम लोगों को धोखा खाते … नकली अनुपम को उठा ले आते हैं ! “

बेचारा बुरी तरह से थका भैंसा , यह सोचकर कि कहीं मालिक पांचवी बार चलने के लिए न कह दे , अपने सिर को जमीन में टिकाकर आँखे मूंद लिया।

” आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस … पता नहीं इन्हें कहाँ से कहाँ ले जायेगा ?…. अरे अभी तक तो हमारा रूट एक ही था यानि यमलोक से पृथ्वी और पृथ्वी से यमलोक … पता नहीं भविष्य में मेरे भैंसे को चन्द्रमा , मंगल और न जाने कहाँ कहाँ से इन लोगों को उठाना पड़ेगा ? …. बहुत प्रोब्लेमैटिक जात है यार ये मानुस “

अब भैसे को नींद आ चुकी थी , थकान के मारे वह खर्राटे भर रहा था , लेकिन यमराज जी आवेग में बके जा रहे थे।

” इस मानुस जात ने हमारे रेकार्ड की भी ऐसी की तैसी कर रखी है, ये तो अब लिंग के साथ भी छेड़छाड़ करने लगे हैं … ये देखो, हमारे रेकार्ड के अनुसार हमने इस आदमी को “ही” बनाकर धरती में भेजा था उस कम्बख्त ने अपना लिंग ही परिवर्तित कराके “शी” बन गया ! … अब जब इसके ज़िन्दगी के दिन पूरे होंगे तो हम उसे कैसे खोजेंगे ? … हमारे रेकार्ड में यह आदमी है और वहां औरत !!!… बहुत समस्या है यार “

अचानक यमराज के दिमाग में यह बात बिजली की तरह कौंध गई , और उन्होंने सोते हुए भैंसे की दुम को मरोड़कर उसे उठा दिया।

” अरे चल तो वापस पृथ्वी … कहीं वो साला अनुपम पृथ्वी में अनुपमा बनकर तो नहीं रह रहा ???”

अभी दोनों रास्ते में हैं

अनुपम नीता बेर्डे
प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बिलासपुर

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