बीज से वृक्ष तक: विनम्रता की यात्रा

बीज से अंकुरित होकर वृक्ष बनना सिर्फ़ बढ़ना नहीं
यह धूप, बारिश, तूफ़ान और समय का कठोर परीक्षण है। अहंकारी डालियाँ टूट जाती हैं, घमंडी पत्ते उड़ जाते हैं, पर जड़ों वाला पुराना वृक्ष अडिग खड़ा रहता है। उसी की छाँव में नई कोंपलें जन्म लेती हैं मजबूत, विनम्र, और जीवन का नया सबक लिए हुए।

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devotees walking in padyatra with drums and chants heading to Sanwariya Seth temple with flowers and devotion

सेठ नहीं साक्षात श्याम हैं सांवरिया

जय सांवरिया सेठ के जयकारों के बीच मंगलवार को संतोष विश्वकर्मा के नेतृत्व में 60 श्रद्धालुओं का जत्था श्री सांवरिया सेठ मंदिर, मंडपिया (राजस्थान) के लिए रवाना हुआ। नगरवासियों ने पुष्पवर्षा कर विदाई दी, और भक्तों ने कहा— यह यात्रा नहीं, आत्मा की पुकार है।

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Pune–Mumbai Expressway missing link near Lonavala showing newly constructed roadway passing through Western Ghats with vehicles in motion and green hills around.

एक मई से खुलेगा पुणे-मुंबई एक्सप्रेसवे का मिसिंग लिंक

पुणे–मुंबई एक्सप्रेसवे पर बन रहा 13 किलोमीटर लंबा ‘मिसिंग लिंक’ केवल ट्रैफिक कम करने की परियोजना नहीं है, बल्कि इसके खुलने से पश्चिम महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था और जीवनशैली पर दूरगामी असर पड़ने की उम्मीद है। प्रस्ताव है कि यह मार्ग 1 मई, महाराष्ट्र दिवस से आम जनता के लिए खोल दिया जाएगा।

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जब भरोसा टूटे, खुद को संभालना सीखें – एक भावुक हिंदी कहानी

डोर जो बंधी है

रिश्तों की उलझनों और आत्मविश्वास की तलाश के बीच झूलती यह कहानी दो बहनोंकनु और मन्नी—की है, जहाँ एक की कठोर सच्चाई दूसरी के टूटते हौसले को फिर से जोड़ने की कोशिश करती है। क्या मन्नी अपनी खोई हुई पहचान और आत्मविश्वास वापस पा सकेगी?

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विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पेड़ लगाते लोग, हरित प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता यथार्थवादी दृश्य।

प्रकृति बदला नहीं लेती, केवल हिसाब बराबर करती है

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रस्तुत यह लेख प्रकृति और मानव के संबंधों पर गंभीर चिंतन करता है। इसमें बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वृक्षों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के दुष्परिणामों को रेखांकित करते हुए पर्यावरण संरक्षण को प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व बताया गया है। लेख यह संदेश देता है कि प्रकृति बदला नहीं लेती, बल्कि समय आने पर अपने साथ किए गए व्यवहार का हिसाब बराबर करती है।

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मशाल थामे साथ दौड़ते लोग, एकता और सामूहिक सफलता का प्रेरक दृश्य।

अहं नहीं, वयं सत्य!

यह कविता ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा को दर्शाती है। अहंकार, प्रतिस्पर्धा और आत्ममुग्धता के बीच सहयोग, मशाल सौंपने और साथ मिलकर मंज़िल पाने का गहरा संदेश देती है।

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गधे पैदा नहीं होते, बनाए जाते हैं…

अगर आप सोचते हैं कि बिना मेहनत के मोटी कमाई संभव नहीं तो जनाब आप गलत हैं। पेश है “बाबा मेकिंग कंपनी प्रा. लि.” का बेमिसाल मॉडल, जहाँ थोड़ी वाकपटुता, थोड़ी झूठ बोलने की कला और चमत्कार बेचने का हुनर आपको रातों-रात ‘दी ग्रेट बाबा’ बना सकता है। लाखों गधे आपका इंतजार कर रहे हैं जो आंख मूंदकर आपके ‘चमत्कार’ पर भरोसा करेंगे। बस दस हज़ार रुपये निवेश कीजिए और करोड़ों में खेलिए। धर्म, चमत्कार और गधों की दुनिया में आपका स्वागत है!

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पुनर्जन्म…

बस से मसूरी की यात्रा पर निकली साक्षी अपने परिवार के साथ मंदिर पहुँचती है। जैसे ही वह मंदिर के अहाते में कदम रखती है, एक बूढ़ा व्यक्ति उसे देखकर दौड़ा चला आता है और कहता है — “बिटिया, तू आ गई! मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था।”
सब हैरान रह जाते हैं। बूढ़ा एक पुरानी तस्वीर दिखाता है . उसमें साक्षी जैसी ही एक लड़की थी, नाम लिखा था “नूरी”। बूढ़े की आँखों में आँसू हैं, और साक्षी के मन में एक अनजाना कंपन।
क्या यह महज़ संयोग है, या सचमुच किसी पुनर्जन्म की कहानी शुरू हो चुकी है?

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मेरे पापा – मेरी ताक़त”

“जब दुनिया ने मुँह मोड़ा, राहें सब सूनी थीं,
पापा के आँगन में उम्मीदें बस जीती थीं।
हर हार में उन्होंने मुझे मुस्कराना सिखाया,
हर गिरने पर खुद उठकर चलना सिखाया।
पापा — आप मेरे भगवान हैं इस ज़मीं पर,
आपके बिना ये जीवन अधूरा सा है हर पल।”

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नागफनी में फूल

यह कविता नागफनी की रूखी शाख़ पर खिले पहले फूल के दृश्य से आरंभ होती है, जो कवि के भीतर एक गहरी, धीमी लहर की तरह उतरता है। यह दृश्य उसे तुम्हारे श्वेत-श्याम जीवन पर चमकती लाल बिंदी, या बरसों बाद आसमान में उतरे इंद्रधनुष जैसा लगता है। लेकिन कवि सवाल करता है कि तुमने अपने चारों ओर यह कठोर आवरण क्यों बना रखा है, जबकि उसने तुम्हारे भीतर मुस्कान का पहला अंकुर, उसका नन्हा पल और एक सांस लेता हुआ बीज देखा है। वह आग्रह करता है कि इस बीज को बढ़ने, खिलने, फलने का अवसर दो—वरना यह भ्रूणहत्या होगी, चाहे वह भ्रूण नौकरीपेशा ही क्यों न हो, जो काँटों के जंगल में भी फूल की आस रखता है। अंत में, कवि आश्वस्त करता है कि यही बीज नागफनी में भी सुगंध फैला देगा और वह स्वयं, दिल की बाहें फैलाए, उसे समेटने को तैयार है।

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