क्या मर्द कभी रोते हैं?

“नहीं, कभी नहीं।”“कभी नहीं?”“नहीं, कभी नहीं।”“सच में, कभी नहीं?”“हाँ, सच में कभी नहीं रोते।” हाँ, सच में मर्द कभी नहीं रोते… कहते-कहते आँखों से आँसू छलक पड़े, और उन छलकते हुए आँसुओं में रवानी कब आ गई, पता ही नहीं चला… मुझे नहीं पता कि मर्द पहली बार कब रोया!क्या जब खुदा ने आदम को…

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डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त बच्चे को प्यार से गोद में लिए एक माँ का भावनात्मक दृश्य

डाउन सिंड्रोम : थोड़ा अलग, लेकिन सबसे खास

डाउन सिंड्रोम एक आनुवंशिक स्थिति है, लेकिन यह किसी बच्चे की संभावनाओं को सीमित नहीं करती। सही देखभाल, संतुलित आहार और माँ के प्यार से ऐसे बच्चे भी आत्मनिर्भर और खुशहाल जीवन जी सकते हैं।

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उज्जैन रेलवे स्टेशन का डिजाइन फिर बदला

उज्जैन रेलवे स्टेशन की डिजाइन बदलने के कारण काम एक बार फिर लेट हो गया है। बताया जा रहा है कि अब स्टेशन का नई डिजाइन में निर्माण सिंहस्थ के बाद ही हो सकेगा।15 महीने पहले उज्जैन समेत इंदौर, नागदा, खाचरौद, आलोट और रतलाम मंडल के 11 रेलवे स्टेशनों का पीएम मोदी ने भूमि पूजन किया था। इनमें से उज्जैन को छोडक़र बाकी सभी स्टेशनों पर कार्य शुरू हो चुका है। नागदा स्टेशन का कार्य अंतिम चरण में है।

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आन है हिंदी

हिंदी हमारी मातृभाषा ही नहीं, बल्कि देश का सम्मान और अभिमान है। इसमें प्रेम बसता है, स्वरों की मधुर तान गूंजती है और हर शब्द अपनी सरस लय से हृदय को छू लेता है। यह हमारी सभ्यता और सरल आचरण की पहचान है, जो चरित्र को निखारती और राष्ट्र की शान को बढ़ाती है। हिंदी के बिना ज्ञान अधूरा है, इसलिए इसे सदा सर्वोपरि रखना ही हमारा कर्तव्य है।

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सही राह !

“सही राह” एक भावनात्मक कहानी है, जिसमें एक पिता अपने बेटे को छोटी-छोटी इच्छाओं से ऊपर उठकर ज्ञान और शिक्षा की ओर प्रेरित करता है। यह कहानी सिखाती है कि असली खुशी और सफलता किताबों और सीखने में छिपी होती है, न कि केवल भौतिक चीजों में।

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हिंदी भाषा, हिंदी बोली

हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर और आत्मीयता की अभिव्यक्ति है। कविताएँ, कहानियाँ और शास्त्रिक ज्ञान इसे जीवंत बनाते हैं। इसकी मधुर ध्वनि, सरल व्याकरण और शृंगारी रूपरेखा भावनाओं को सीधे हृदय तक पहुँचाती हैं। हिंदी हमें भारतीय संस्कृति, ज्ञान और प्रेम से जोड़ती है, और यह भाषा हमारी पहचान और गर्व का प्रतीक है।

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मैं मुक्त होना चाहती हूँ

मैं मुक्त होना चाहती हूँ…

मैं मुक्त होना चाहती हूँ — यह सिर्फ एक ख्वाहिश नहीं, बल्कि मेरी आत्मा की पुकार है। उन अदृश्य ज़ंजीरों से आज़ाद होने की चाह, जो मेरे विचारों, रिश्तों और सपनों को जकड़े हुए हैं। यह एक सफर है खुद को पहचानने का, अपने भीतर के डर को हराने का, और उस जीवन को जीने का, जहाँ मैं बिना किसी शर्त के खुद को स्वीकार सकूँ।”

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माया का जाल और आत्मा की उड़ान

जैसा कि वेद-पुराणों में वर्णित है कि चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् मनुष्य जीवन की प्राप्ति होती है। कहा गया है “जनमत मरत दुःसह दुख होई।”
प्राणी जब एक बार जन्म लेता है और मरता है, तब लाखों बिच्छुओं के डसने जैसी पीड़ा सहनी पड़ती है। बड़े सत्कर्मों के फलस्वरूप विवेकशील प्राणी मानव रूप में इस नश्वर जगत में जन्म लेता है।

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कमलसिंह का ठेलाः यादों की पीली दोपहरें

गांव से बड़े स्कूल में आना नया अनुभव था जेब में रोज़ के सिर्फ़ दस पैसे, और आधे इंटरवल में कमलसिंह बापू के ठेले से पाँच पैसे के दो केले ही हमारा भोजन। वही ठेला छात्रों की राजनीति का अड्डा था, जहाँ बापू कभी रावण, कभी विदूषक तो कभी किंगमेकर बनकर चमकते। उधार की सीमा पच्चीस पैसे तक थी, पर मुस्कुराकर केले थमा देने वाला उनका अपनापन आज भी स्मृति में ताज़ा है. छोटे दिनों की बड़ी गर्माहट जैसा।

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