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मायके की याद और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच खड़ी एक भारतीय महिला

औरत का मायका: सामने होकर भी कितना दूर

बेटी से बहू, पत्नी और माँ बनने के सफर में औरत कब अपनी इच्छाओं को पीछे छोड़ देती है, उसे पता ही नहीं चलता। मायका सामने होकर भी दूर रह जाता है। यह कविता स्त्री की जिम्मेदारियों, मायके की यादों और उसके हिस्से के सुकून की मार्मिक अभिव्यक्ति है।

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अकेला व्यक्ति अपनी भावनाओं और दर्द के साथ मौन बैठा हुआ, सुनने वाले की तलाश में

‘विलुप्त श्रोता’

‘विलुप्त श्रोता’ एक मार्मिक मुक्तछंद कविता है, जो मनुष्य के भीतर जमा होते दर्द, भावनात्मक थकान और ऐसे समय की विडंबना को उजागर करती है जहाँ सुनने वाले लोग धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं।

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अँधेरे से उजाले की ओर बढ़ते व्यक्ति का प्रतीकात्मक दृश्य, आत्मविश्वास और अपनी राह बनाने की प्रेरक भावना को दर्शाती हिंदी कविता।

अपनी राह: अँधेरे से उजाले तक

दूसरों के बनाए रास्तों पर चलने के बजाय अपनी मंज़िल खुद तलाशने का संदेश देती यह प्रेरक हिंदी कविता आत्मविश्वास, संघर्ष और हौसले की ताकत को खूबसूरती से व्यक्त करती है।

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रीमा राय सिंह बनीं राष्ट्रीय कवि संगम मुंबई की नई अध्यक्ष

राष्ट्रीय कवि संगम की मुंबई महानगर इकाई के पुनर्गठन समारोह में विश्वप्रसिद्ध संगीतकार सरदार कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में श्रीमती रीमा राय सिंह को नई अध्यक्ष घोषित किया गया। राष्ट्रीय अध्यक्ष जगदीश मित्तल ने ऑनलाइन संबोधन में कहा कि रीमा जी के नेतृत्व में इकाई ‘राष्ट्र जागरण धर्म हमारा’ के ध्येय वाक्य को सार्थक करेगी। कार्यक्रम में अनेक प्रसिद्ध कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं से साहित्यिक वातावरण को भावपूर्ण बना दिया।

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पुराना बरगद का पेड़ 

रिक्त लटका झूला सावन में,
पुराने बरगद के पेड़ में,
ताक रहा है राह को —
ना जाने कब आएंगी बेटियाँ।
पूछ रहा है वो पुराना बरगद का पेड़ —
अब सावन में क्यों नहीं आतीं हैं बेटियाँ?

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गलतफहमियांँ

गलतफहमियांँ… एक ऐसी आग जो बिना लगाए ही सब कुछ भस्म कर देती है। रिश्ते, अहसास, अरमान — सब इसकी चक्की में पिस जाते हैं। अपनों को अपनों से दूर करने वाली यही गलतफहमियांँ, जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन जाती हैं।

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भारतीय युवा चर्चा करते हुए

क्या भारत का Gen Z गालीबाज है?

क्या कुछ लोगों के व्यवहार के आधार पर पूरी Gen Z पीढ़ी को कठघरे में खड़ा करना उचित है? यह विचार लेख शिक्षा, संस्कार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर चर्चा करता है। लेखक का मत है कि भारत के अधिकांश युवा मेहनती, जागरूक और संस्कारी हैं तथा कुछ घटनाओं के आधार पर पूरी पीढ़ी की छवि बनाना उचित नहीं है। यह लेख समसामयिक मुद्दे पर संवाद और आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है।

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खिड़की के पास रखी गर्म चाय का कप, शीशे पर गिरती बारिश की बूँदें और यादों में खोया एक व्यक्ति, जो प्रेम और सुकून भरे पलों को याद कर रहा है।

रूमानी बारिश

कुछ रिश्ते समय के साथ खत्म नहीं होते, वे यादों में बस जाते हैं। बारिश की बूँदें, चाय की गर्माहट और किसी अपने की मीठी यादें मिलकर दिल में एक ऐसी दुनिया बना देती हैं, जहाँ प्रेम कभी पुराना नहीं पड़ता।

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रेडियो स्टेशन पर खामोश होते लम्हे

दौर के विविध भारती स्टेशन पर ‘हमारे मेहमान’ कार्यक्रम के लिए रिकॉर्डिंग तो सिर्फ आधे घंटे चली, लेकिन जब फांसी की पुरानी घटना का जिक्र हुआ, तो माहौल एकदम बदल गया। एनाउंसर सुधा शर्मा जी गीत के बीच अचानक मौन हो गईं — “रहे ना रहे हम, महका करेंगे…” गीत की पंक्तियाँ जैसे कमरे की संवेदना में घुल गईं।
जब मैंने 1996 में उज्जैन सेंट्रल जेल में देखी गई फांसी की घटना सुनानी शुरू की, तो सुधा जी की आँखों से आंसू बहने लगे। वे रुमाल से आँखें पोंछतीं, लंबी साँस भरतीं और कहतीं, “हां भाई साब, आगे बताइए…”
उनका हर सवाल—“सच में देखा?”, “डर नहीं लगा?”, “नींद आ गई थी उस रात?”—एक गहरी संवेदना और जिज्ञासा से भरा था। इंटरव्यू से ज़्यादा वक्त उस घटना की परतें खोलते हुए बीता।

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