माया का जाल और आत्मा की उड़ान

विजय लक्ष्मी, प्रसिद्ध लेखिका

“ओ मेरी वासना, तुम चलो अगम के पार।
अगम पार, अपार पार—तहाँ है तेरो करार।”

जैसा कि वेद-पुराणों में वर्णित है कि चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् मनुष्य जीवन की प्राप्ति होती है। कहा गया है “जनमत मरत दुःसह दुख होई।”
प्राणी जब एक बार जन्म लेता है और मरता है, तब लाखों बिच्छुओं के डसने जैसी पीड़ा सहनी पड़ती है। बड़े सत्कर्मों के फलस्वरूप विवेकशील प्राणी मानव रूप में इस नश्वर जगत में जन्म लेता है।

सांसारिक होने के नाते उसे जीवन-यापन के लिए अनेक वस्तुओं की आवश्यकता होती है। हालाँकि यह जगत स्वयं नश्वर हैएक समय ऐसा अवश्य आता है जब सब कुछ समाप्त हो जाता है। फिर भी मानव मोह-माया, ईर्ष्या-द्वेष, लोभ-लालच में ही रचा-बसा रहता है, जीवन की अंतिम श्वासों तक। माया रूपी मकड़ी का जाल वह स्वयं बुनता है और उसी में फँस जाता है। जीवनभर उसी जाल में उलझा रहता है।

फिर एक समय आता है जब उसकी अंतिम श्वास थम जाती है और जीवन-लीला समाप्त हो जाती है। इस प्रकार वह पुनः आवागमन के चक्र में फँस जाता है और बार-बार जन्म-मरण का दुःसह दुख भोगता है।

महाभारत का एक संदर्भ स्मरण हो आता है. जब चक्रव्यूह में फँसकर अभिमन्यु जैसे वीर योद्धा को स्वर्ग सिधारना पड़ा। तब अर्जुन व्यथित होकर अपने सखा माधव के पास पहुँचे और बोले-“माधव! इतनी बड़ी व्यथा लेकर अब मैं और जीना नहीं चाहता। मुझे किसी प्रकार इस आवागमन के चक्र से मुक्त कर दो। आप यह तो कर ही सकते हैं न? अब मैं और जीना नहीं चाहता।”

माधव बोले-“पार्थ, तनिक धैर्य धरो और ध्यान से सुनो। हम सभी यहाँ तक कि देवता भी इस आवागमन से मुक्त नहीं हैं। हमें भी आदेशानुसार अनेक बार जन्म लेना और मरना पड़ता है। जब हम स्वयं आवागमन में हैं, तो तुम्हें इससे मुक्त कैसे कर सकते हैं, पार्थ?

हम तुम्हें इस संसार के समस्त सुख दे सकते हैं, पर आवागमन से मुक्ति का केवल एक ही मार्ग है ‘तारतम ज्ञान’, जो अट्ठाईसवें कलियुग में ही प्राप्त होगा। उसका निरंतर जप करके ही आवागमन के चक्र से मुक्ति संभव है।

तुलसीकृत रामायण में कहा गया है-‘कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिरि-सुमिरि नर उतरहिं पारा।’

और गीता में लिखा है- ‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः’ जो उत्तम पुरुष है, उसका स्थान कहीं और है; उसका धाम और उसकी लीला इस संसार से परे अन्यत्र चल रही है।

हे पार्थ! क्षर-अक्षर के पार उस पूर्ण ब्रह्म, अक्षरातीत परमात्मा का निवास परमधाम है, जहाँ उनकी स्व-लीला अद्वैत रूप में आत्माओं के साथ निरंतर चलती रहती है। अपनी आत्मा को उस अगमपार, अपार पार में लगाओ। वहीं उनके चरणों में ही सच्चा चैन और करार प्राप्त होगा।

कहा जाता है कि बारह हजार ब्रह्मप्रियाएँ उनके चरणों में क्रीड़ा करती हैं, पर यह केवल कथन मात्र है—वास्तव में वह स्व-लीला अद्वैत की भूमि है, जैसे सूर्य और उसकी किरणें, या सागर और उसकी लहरें अभिन्न।

इस संसार में चाहे कितना ही धन या सम्मान क्यों न अर्जित कर लो, सब यहीं रह जाना है। इसलिए जीवित रहते हुए अपनी आत्मा को उस परब्रह्म, अक्षरातीत के चरणों में लगाना परम आवश्यक है। निरंतर उनके सुमिरन और तारतम ज्ञान के जप का अभ्यास करके, उस अगम के पार जहाँ अखंड सुख की स्व-लीला अद्वैत चल रही हैउस आनंद में सहभागी बनकर सदा-सदा के लिए आवागमन से मुक्त हो जाना ही जीवन का परम लक्ष्य है। इस प्रकार माधव ने अपने अगाध मित्र अर्जुन को समस्त वृत्तांत समझाया और आवागमन के चक्र से सदा के लिए मुक्त होने का मार्ग दिखाकर उसे वास्तविक जीवन-दर्शन से रूबरू कराया।

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