“नहीं, कभी नहीं।”
“कभी नहीं?”
“नहीं, कभी नहीं।”
“सच में, कभी नहीं?”
“हाँ, सच में कभी नहीं रोते।”
हाँ, सच में मर्द कभी नहीं रोते… कहते-कहते आँखों से आँसू छलक पड़े, और उन छलकते हुए आँसुओं में रवानी कब आ गई, पता ही नहीं चला…
मुझे नहीं पता कि मर्द पहली बार कब रोया!
क्या जब खुदा ने आदम को जन्नत से निकाला था, तब पहली बार रोया?
या फिर जब उसने अपने बच्चों को एक मामूली सी शक्ल-सूरत वाली लड़की के लिए लड़ते देखा, और देखते ही देखते एक भाई ने दूसरे भाई को क़त्ल कर दिया — शायद अपनी बेबसी का आलम देखकर तब पहली बार रोया?
या किसी से बिछड़ने पर पहली बार रोया?
या फिर किसी से भी ताल्लुक़ ना होने पर पहली बार रोया?
शायद मुझे पता ही नहीं कि ये पत्थर पहली बार कब रोया… या फिर कभी रोया ही नहीं!
जो लोग अपने हालात का इज़हार लोगों से करते हैं, उनके हालात शायद बेहतर होते हैं। लेकिन वे लोग जो सारे जहान का बोझ अपने सीने पर उठाए फिरते हैं, उनसे हमें सचमुच डरना चाहिए।
क्योंकि ऐसे लोग अपनी शिकायत इंसानों से नहीं, सीधे ख़ुदा से करते हैं — और मुझे यक़ीन है कि उन्होंने अब तक अपने मामले में ख़ुदा को शामिल नहीं किया है।
लेकिन डर इस बात का है कि जिस दिन वे रोते हुए ख़ुदा से शिकायत करेंगे, उस दिन हमें न सिर्फ़ ख़ुदा की पनाह की ज़रूरत होगी, बल्कि उन लोगों से भी माफ़ी और तलाफ़ी करनी होगी।
…और हाँ,
मर्द कभी नहीं रोते।

सरोश शाह, युवा लेखक, पुणे
