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दरिया और किनारा

कविता में दरिया को जीवन के संघर्ष और पवित्रता का प्रतीक बनाया गया है। दरिया मस्ती और ऊर्जा के साथ बढ़ती है, अपने रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं को पार करती है, किनारों से संबंध बनाए रखती है और दूसरों के कष्ट और पापों को समेटती है। यह अपने गंतव्य की ओर दृढ़ता और गति से बढ़ती है, अंततः समुद्र की विशाल बाहों में विलीन होकर अपने सफर का निष्कर्ष प्राप्त करती है। यह कविता दर्शाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी बाधाएँ आएँ, संयम, धैर्य और अपने मूल्यों के साथ मार्ग पर बढ़ते रहना ही सफलता की कुंजी है।

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क्या मर्द कभी रोते हैं?

“नहीं, कभी नहीं।”“कभी नहीं?”“नहीं, कभी नहीं।”“सच में, कभी नहीं?”“हाँ, सच में कभी नहीं रोते।” हाँ, सच में मर्द कभी नहीं रोते… कहते-कहते आँखों से आँसू छलक पड़े, और उन छलकते हुए आँसुओं में रवानी कब आ गई, पता ही नहीं चला… मुझे नहीं पता कि मर्द पहली बार कब रोया!क्या जब खुदा ने आदम को…

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