जिंदगी कुछ इस तरह…

मेरी पसंद की
एक शाम होती थी
गुज़र गई

मेरे दिल के करीब
जो शहर था
छूट गया

एक प्याली चाय
और जो दो होंठ थे
बिछड़ गए

मेरी क्यारी से
मेरी पसंद का गुलाब
कोई ले गया

मेरे गाल का गुलाल
और साथ शबाब
कोई ले गया

मेरी आँखों का काजल
होठों का अंगार और गर्म कान
मेरे जिस्म पर चुम्बन की कल्पना
कोई ले गया

दो जिस्म, एक धड़कन
अपने हृदय में भर गया
मेरे हर अज़ीज़ को
रक़ीब अपने नाम कर गया..

निवेदिता श्रीवास्तव गार्गी जमशेदपुर झारखंड

4 thoughts on “जिंदगी कुछ इस तरह…

  1. निवेदिता श्रीवास्तव जी की कविता … खूबसूरत👍🏻

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