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स्कूल यूनिफॉर्म पहने चार दोस्त कंधे से कंधा मिलाकर हँसते हुए स्कूल की ओर जाते हुए, जो बचपन की सच्ची दोस्ती और यादों का प्रतीक हैं।

दोस्त

बचपन की पाठशाला, दोस्तों के साथ बिताए सुनहरे पल, साझा टिफ़िन, इम्तिहान की शरारतें और जीवनभर साथ निभाने वाले रिश्तों की भावनाओं को समेटे यह कविता सच्ची दोस्ती का खूबसूरत चित्र प्रस्तुत करती है। यह हर उस व्यक्ति के दिल को छू जाएगी, जिसने कभी अपने स्कूल के दोस्तों को याद किया हो।

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डिजिटल मोहब्बत

आज मोहब्बत के तौर-तरीके बदल चुके हैं। अब प्रेम चिट्ठियों में नहीं, बल्कि मोबाइल की स्क्रीन पर लिखे मैसेज और इमोजी में छुपे दिल के संदेशों में दिखाई देता है। कभी व्हाट्सएप कॉल से मुलाक़ात शुरू होती है तो कभी वीडियो चैट में जज़्बात उमड़ते हैं।

जहाँ पहले चाँद-तारों की बातें होती थीं, वहीं अब ऑनलाइन स्टेटस ही बहुत कुछ कह जाता है। “टाइपिंग…” का छोटा-सा शब्द भी दिल की धड़कनों को तेज़ कर देता है और चैट बॉक्स ही दिल के हालात का दर्पण बन जाता है।

सेल्फ़ी में मुस्कान, फिल्टर का जादू और रील्स में झलकता इश्क़ आज के रिश्तों की पहचान बन चुके हैं। कभी स्वाइप लेफ़्ट, कभी स्वाइप राइट — यही है मोहब्बत का नया डिजिटल अंदाज़।
फिर भी सच्चाई यही है कि दिल आज भी वैसा ही है जैसा पहले था। जिसे चाहा वही सबसे क़ीमती खजाना है। तकनीक और साधन बदल गए, तौर-तरीके बदल गए, पर प्यार का जादू आज भी उतना ही पुराना और उतना ही सुहाना है।

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वेस्टर्न रेलवे ने हर्षोल्लास से मनाया बांद्रा स्टेशन महोत्सव

पश्चिम रेलवे द्वारा 26 जुलाई 2025 को “बांद्रा स्टेशन महोत्सव” उत्साहपूर्वक मनाया गया। इस अवसर पर बांद्रा स्टेशन की ऐतिहासिक धरोहर और सांस्कृतिक पहचान का जश्न मनाया गया। कार्यक्रम की शुरुआत विशेष स्मारक कवर के विमोचन से हुई, जिसे पश्चिम रेलवे के अपर महाप्रबंधक प्रदीप कुमार, मुंबई सेंट्रल मंडल के मंडल रेल प्रबंधक पंकज सिंह और डाक सेवा निदेशक काया अरोरा ने जारी किया।

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ratna writer

डॉ. रत्ना मानिक : एक संवेदनशील लेखिका

डॉ. रत्ना मानिक एक ऐसी हिंदी लेखिका हैं, जो समाज की पीड़ा, मानवीय संवेदनाओं और ज्वलंत मुद्दों को अपनी सशक्त और स्पष्ट लेखनी के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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महिदपुर रोड ने खोई अपनी ‘विमला भाभी’

महिदपुर रोड के पुराने पीपल के पास रहने वाली मशहूर पारंपरिक दाई ‘ विमला भाभी’ का निधन हो गया. विमला भाभी स्वर्गीय मांगीलाल जी चौहान की धर्मपत्नी, कैलाशचंद्र चौहान, स्व.रमेशचंद्र चौहान की भाभीजी तथा लोकेंद्र, नरेंद्र, स्वर्गीय मनोज की माताजी तथा अंकित की दादी जी विमला बाई चौहान का निधन शनिवार शाम को हो गया.

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कंचनमाला अमर हिंदी लेखिका

कंचनमाला ‘अमर’: बहुआयामी हस्ताक्षर 

हिंदी साहित्य की सशक्त और बहुआयामी हस्ताक्षर कंचनमाला ‘अमर’, जिन्हें साहित्यिक जगत में ‘उर्मी’ के नाम से भी जाना जाता है, एक प्रतिभाशाली लेखिका, शिक्षिका, गायिका और कला-साधिका हैं। उनका व्यक्तित्व शिक्षा, कला और साहित्य के सुंदर समन्वय का जीवंत उदाहरण है।

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पेंशन फाइल पर हस्ताक्षर करते सरकारी अधिकारी और सामने उम्मीद भरी निगाहों से खड़ा एक बुज़ुर्ग

हस्ताक्षर…

एक बुज़ुर्ग अपनी पेंशन के लिए दफ़्तर के चक्कर लगा रहा था, जबकि उसकी फाइल केवल एक हस्ताक्षर की प्रतीक्षा में अटकी थी। यह कहानी बताती है कि किसी सरकारी कर्मचारी का एक हस्ताक्षर केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि किसी ज़रूरतमंद की उम्मीद, सम्मान और जीवन का सहारा भी हो सकता है।

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अकेला व्यक्ति उदास बैठा हुआ, दिल टूटने और तन्हाई के भाव को दर्शाता हुआ

क्या कहें हम

यह ग़ज़ल टूटे दिल, अधूरी उम्मीदों और बेवफाई के गहरे दर्द को बयां करती है। हर शेर उस पीड़ा को छूता है, जहाँ अपना ही इंसान अजनबी बन जाता है। यह रचना उन अनकहे जज़्बातों की आवाज़ है, जिन्हें शब्दों में कहना आसान नहीं होता।

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प्रेम होने तो दो

प्रेम की कथा इतनी सरल नहीं कि शब्दों में बाँधी जा सके। “धरती सब मसि कियो, लेखनी सब बनराई”—यह यूँ ही नहीं लिखा गया। जब प्रेम को लिखना चाहा, तो लेखनी ने हार मान ली। उसमें धूल, राख और व्यापार की कठोरता निकल पड़ी। क्योंकि प्रेम में कोई सौदा नहीं होता, कोई मोल नहीं होता।

कभी प्रेम में एक महामौन था, जिसमें न मिलने का डर था, न खोने का भय। स्त्री अपने घर की नींव संभालने आई, पुरुष घर को भरने कमाने निकला। पर प्रेम की अनुगूँज बहती रही—नदियों में, झरनों में, लहरों में, हवाओं में… बिना कहे, बिना सुने।

जो प्रेम को अभिशाप कहकर कोसता है, वह भी जानता है कि प्रेम होना ही सबसे बड़ा वरदान है। लेकिन प्रेम करने से पहले, उसे समझना, महसूस करना, जीना आना चाहिए।

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गीता उठा

क्यों रंगहीन हो जीवन तेरा, देखोयह बनफूल फिर से महक उठा। पियुष पी कर हो रहे जो उन्मत्त तब,विषधर की कल्पना से मैं जी उठा। रजत-कंचन ही है, चमकते सोच मत,आग में यूँ ती नहीं, वो जल उठा। अधर्म की जब-जब हो विजय,कर सामना तू धर्म का, धनुष उठा। क्यों दीन-हीन यूँ बन बैठे हो,जरा…

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