एक उदास महिला खिड़की के पास बैठी है, आंखों में आँसू, हाथ में पुरानी चिट्ठी, धुंधली रोशनी में प्रेम और विरह की भावना झलकती हुई।

इश्क़ की इंतहा

राँची, झारखंड की कवयित्री अर्पणा सिंह की यह मार्मिक ग़ज़ल प्रेम, विरह, तड़प और आत्मिक समर्पण की गहराइयों को उजागर करती है। “ज़िंदगी में तुम नहीं तो ज़िंदगी कुछ भी नहीं” पंक्ति के माध्यम से प्रेम की पूर्णता और विरह की पीड़ा का संवेदनशील चित्रण किया गया है।

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5 और ट्रेनों में तत्काल टिकट के लिए लगेगा ओटीपी

भारतीय रेलवे तत्काल टिकट बुकिंग प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए चरणबद्ध तरीके से नया ओटीपी
आधारित प्रमाणीकरण सिस्टम लागू कर रही है. इसी क्रम में सेंट्रल रेलवे की ५ और ट्रेनों में यह नई व्यवस्था १९ दिसंबर २०२५ से लागू की जा रही है.भारतीय रेलवे तत्काल टिकट बुकिंग प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए चरणबद्ध तरीके से नया ओटीपी आधारित प्रमाणीकरण सिस्टम लागू कर रही है.

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महिला खिड़की के पास बैठकर कविता लिखते हुए, भावनात्मक और रचनात्मक माहौल

मेरी प्रिय कविता

“मेरी प्रिय कविता” एक ऐसी भावनात्मक रचना है, जिसमें कवयित्री ने अपने मन और शब्दों के बीच के गहरे संबंध को बेहद सहज और सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया है। यह कविता बताती है कि कैसे कविता केवल शब्दों का समूह नहीं होती, बल्कि यह मन की उलझनों को सुलझाने का माध्यम भी बन जाती है।

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धूल से ढके पेड़ के नीचे साइकिल के पास खड़ी एक लड़की, पर्यावरण और प्रकृति के संवाद का प्रतीक

प्रकृति और मैं…

यह रचना मनुष्य और प्रकृति के बीच के गहरे और जटिल संबंध को उजागर करती है। एक साधारण-सी प्रतीत होने वाली घटना एक लड़की का साइकिल रोककर पेड़ के नीचे खड़ा होना. धीरे-धीरे एक गहन संवाद में बदल जाती है, जहाँ एक पत्ती स्वयं बोलकर प्रकृति की पीड़ा व्यक्त करती है।

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“पूर्णिमा की रात समुद्र किनारे चाँदनी में चमकती लहरें, शांत वातावरण में भावनात्मक गहराई का दृश्य”

लहरें…

यह कविता शांत चित्त और गहरी भावनाओं को चाँद और समुद्र की लहरों के माध्यम से व्यक्त करती है, जहां मिलन की तड़प और प्रकृति का अद्भुत संबंध झलकता है।

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धरती माँ के प्रतीकात्मक स्वरूप के साथ वृक्षों की कटाई, सूखती नदियों और पिघलते ग्लेशियरों को दर्शाता पर्यावरण संरक्षण का यथार्थवादी दृश्य।

प्रकृति की चेतावनी

“प्रकृति की चेतावनी” धरती माँ की ओर से मानवता को दिया गया एक मार्मिक संदेश है। कविता में वृक्षों की कटाई, नदियों की दुर्दशा, पिघलते ग्लेशियर और पर्यावरण संकट की गंभीरता को उजागर किया गया है। यह रचना मनुष्य को चेताती है कि यदि समय रहते प्रकृति का संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।

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संघर्ष से सफलता की ओर बढ़ता व्यक्ति, अंधेरे से उजाले की तरफ जाते हुए, उगते सूरज का दृश्य

ठोकरों से ताज तक

यह ग़ज़ल एक साधारण व्यक्ति के भीतर छिपी असाधारण संभावना की कहानी है, जहाँ संघर्ष, आत्मविश्वास और उम्मीद एक साथ चलते हैं। कवि मानता है कि अभी भले ही वह “ख़ाक” है, पर उसी मिट्टी से एक दिन उसका “चाँद” उभरेगा .यही सच्ची जीवन प्रेरणा है। दुनिया भले उसे कमतर आँके, लेकिन उसका विश्वास अडिग है कि मेहनत और सब्र से वह खुद को निखारेगा। हर ठोकर उसे गिराने के बजाय आगे बढ़ने की ताकत देती है, जो अंततः सफलता की ओर ले जाती है।

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यक्ष प्रश्न

डॉक्टर की क्लीनिक में बैठकर हर बार वही विचार उमड़ते हैं—काश कुछ फैसले अलग लिए होते, कुछ कदम गलत न उठाए होते। कभी-कभी मन इतनी थकान से भर जाता है कि लगता है जैसे सन्त-महात्माओं जैसा शांत, संयमित जीवन ही समाधान हो। पर तभी खुद से सवाल उभरता है क्या वे भी कभी बीमारी से अछूते रहे होंगे? कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर न तो किसी किताब में मिलता है, न किसी प्रवचन में…..

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सफ़र

ऐ वक्त, ज़रा ठहर जा। मुझे अपने आप से कुछ बातें करनी हैं। यादों की किताब में बिखरे किस्सों को फिर से पढ़ना है। बचपन के उन दिनों को याद करना है जब बेख़ौफ़ होकर खेलते और रातों को आसमान में तारे गिनते थे। सखियों संग बिताए यौवन के मधुर पलों को जीना है, जब बातें करते-करते पहर बीत जाते थे। बाबुल का घर, अम्मा का आंचल और भाई-बहनों का साथ छूटने की कसक अब भी भीतर कहीं घुटती है। सात वचन लेकर शुरू हुए नवजीवन की यादें भी हैं, जो धीरे-धीरे गृहस्थी की उलझनों में बिखर गईं। बच्चों की किलकारियों से गूंजते घर का आनंद था, जिसमें रातें भी उजली लगती थीं। समय कैसे बीत गया, यह समझ ही नहीं आया। अब जीवन की भाग-दौड़ में, शेष बची स्मृतियों के सहारे, सफ़र मानो शून्य की ओर बढ़ता जा रहा है।

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खिड़की के पास खड़ा एक व्यक्ति, आंखों में आंसू और दूर किसी की याद में डूबा हुआ भावनात्मक दृश्य

रूबरू एहसास

एक अरसा बीत गया उससे मिले हुए, लेकिन वह हर पल, हर सांस में किसी अनकही बातचीत की तरह मौजूद रहा। उसकी उपस्थिति इतनी गहरी थी कि शब्दों को रोकने की कोशिश के बावजूद, आँखें सब कुछ कह गईं। जीवन और मृत्यु के बीच का फर्क भी जैसे धुंधला पड़ गया जो खो गया, वही भीतर कहीं जीवित हो उठा।

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