चलता चल राही
चलता चल राही” एक प्रेरणादायक कविता है, जो बताती है कि जीवन की राह में कांटे, बाधाएँ और संघर्ष आएँगे, लेकिन रुकना नहीं बस चलते रहना ही विजय का मार्ग है।

चलता चल राही” एक प्रेरणादायक कविता है, जो बताती है कि जीवन की राह में कांटे, बाधाएँ और संघर्ष आएँगे, लेकिन रुकना नहीं बस चलते रहना ही विजय का मार्ग है।
डॉ. रुपाली गर्ग, मुंबई जीवन की सच्चाई अक्सर सतह पर नहीं, उसकी गहराइयों में छिपी होती है। इसे समझने के लिए हमें कभी-कभी ठहरकर अपने भीतर झांकना पड़ता है। मेरे जीवन में भी एक ऐसा ही अनुभव आया, जिसने मुझे जीवन की गहराई से परिचित कराया। यह उन दिनों की बात है जब सब कुछ…
यह ग़ज़ल सिर्फ मोहब्बत की कहानी नहीं, बल्कि खुद से मिलने का एक सफर है। इसमें हिज्र का दर्द है, सब्र की तपिश है और बदलते रिश्तों की कड़वी सच्चाई भी।
हम कितने अलग हैं — फिर भी साथ हैं।
तुम दिन हो, उजले और स्पष्ट, जबकि मैं रात हूं — रहस्यमयी, गहराई में डूबी हुई।
तुम स्थिर तट की तरह शांत हो, और मैं बहते झरने की तरह बेफिक्र, निरंतर गतिमान।
तुम पर्वत की तरह अडिग और दृढ़ हो, जबकि मैं हवा की तरह चंचल, हर दिशा में बिखरती हुई।
मुंबई के गोरेगांव स्थित मृणालताई हॉल में चित्र नगरी संवाद मंच द्वारा साहित्य, संगीत और संवेदना से सजी एक मनभावन शाम आयोजित हुई। सकारात्मकता-नकारात्मकता पर रोचक चर्चा, कालजयी कविताओं का पाठ, ग़ज़लों की महक और पुस्तक विमोचन ने इस कार्यक्रम को खास बना दिया। साहित्यकारों, कलाकारों और श्रोताओं की दमदार मौजूदगी ने पूरे माहौल को जीवित और अर्थपूर्ण बनाया।
“सच्चा सारथी” एक हृदयस्पर्शी संस्मरण है, जिसमें लेखिका ने अपनी सच्ची मित्र हेमलता के निस्वार्थ सहयोग, आत्मीयता और कठिन समय में निभाए गए साथ को भावपूर्ण शब्दों में व्यक्त किया है। जीवन के संघर्ष, मानसिक पीड़ा और पारिवारिक संकट के बीच एक सच्चे मित्र ने किस प्रकार संबल बनकर जीवन को नई दिशा दी, यह रचना उसी अनुभव का सजीव चित्रण है। यह संस्मरण बताता है कि सच्ची मित्रता केवल साथ निभाने का नहीं, बल्कि जीवन को संभालने का भी नाम है।
एक पेम में पानी पोतकर स्लेट पर अक्षर उकेरना यही तो हमारा पहला विद्यालय था। उंगलियों की पकड़, बाबूजी की बनाई लकीरों पर चलना, स्लेट का टूटना और फिर भी सीखने का हौसला… सब याद है। आज बच्चे टचस्क्रीन पर लिखते हैं, मगर हमें अक्षर पेम की खुरदरी चुभन से मिले थे। पानी पोतने से अक्षर मिटते थे, पर बचपन के सबक मन में उतनी गहराई से छप जाते थे कि आज भी स्मृतियों की स्लेट पर चमकते हैं। सच कहें तो हमने सिर्फ अ-आ नहीं सीखा था, हमने जीवन सीखा था।
माँ के रहते मायका सिर्फ एक घर नहीं, बल्कि प्यार, अपनापन और प्रतीक्षा का दूसरा नाम होता है। लेकिन माँ के जाने के बाद वही घर क्यों पराया-सा लगने लगता है? ‘पराया मायका’ एक ऐसी भावुक लघुकथा है, जो हर बेटी के दिल में छिपे उस खालीपन को शब्द देती है, जिसे केवल माँ की अनुपस्थिति ही पैदा कर सकती है।
मेरी ज़िंदगी एक जगह से शुरू नहीं हुई।
वह एक किराए के मकान से दूसरे तक भटकती रही। यह घर सिर्फ़ ईंट और सीमेंट से नहीं बना, इसमें हमारे डर, संघर्ष और सपने बसे हैं। इसीलिए यह साधारण-सा घर मेरे लिए बहुत हसीन है।
साउथ सुपरस्टार पवन कल्याण अभिनीत मेगा बजट फिल्म ‘हरिहर वीरमल्लू (धर्मयुद्ध)’ 24 जुलाई को देशभर में पांच भाषाओं में रिलीज हुई। इस ऐतिहासिक फिल्म में उज्जैन के भस्म रमैया भक्त मंडल को धर्म की धुरी के रूप में विशेष भूमिका मिली है। यह फिल्म विदेशी आक्रांताओं द्वारा भारत में किए गए मंदिरों के विध्वंस और सनातन धर्म की रक्षा में समर्पित वीरमल्लू के जीवन पर आधारित है। फिल्म में पवन कल्याण ने धर्मरक्षक वीरमल्लू की भूमिका निभाई है, जबकि बॉबी देओल औरंगज़ेब के रूप में नजर आएंगे।