gulmohar

प्रेम…हुई शाम उनका ख़्याल आ गया… 🎵🎶

रात की निस्तब्धता में प्रेम का प्रश्न भीतर गूंज रहा था। संगीत की सधी स्वर लहरियाँ मन को ऐसे छू गईं कि सब तर्क-वितर्क, प्रश्न-उत्तर उस तकिए पर ढुलकी एक बूंद में विलीन हो गए… जैसे प्रेम समझाने का नहीं, केवल महसूस करने का विषय हो।

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पाकिस्तान में आटा 135 रुपये किलो पार

इस्लामाबाद.पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर भूख और महंगाई संकट का सामना कर रहा है. गेहूं और आटे की कीमतों में बेतहाशा उछाल ने हालात बिगाड़ दिए हैं. सरकार भले ही पर्याप्त स्टॉक होने का दावा कर रही हो, लेकिन बाजार की तस्वीर कुछ और ही बयां कर रही है. कराची समेत देशभर…

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होली के रंगों में सराबोर दंपति, हवा में उड़ता गुलाल और पृष्ठभूमि में सुनहरी फागुन की रोशनी

देखो होली आई है…

यह कविता होली के रंगों में डूबी प्रेम और प्रतीक्षा की कथा कहती है। फागुन की पुरवाई, लाल-गुलाबी रंग और प्रियतम की स्मृतियाँ सब मिलकर विरह को और भी मधुर बना देते हैं। यह रचना उत्सव के बीच छुपी प्रेम की तड़प को खूबसूरती से अभिव्यक्त करती है।

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पापा की खाली लकड़ी की कुर्सी, जिस पर उनकी यादें आज भी जीवित हैं – भावुक हिंदी संस्मरण

कुर्सी

घर के एक कोने में रखी वह पुरानी कुर्सी आज भी केवल लकड़ी का एक फर्नीचर नहीं लगती। वह पिता की आदतों, उनके अनुशासन, उनके स्नेह और पूरे परिवार की अनगिनत यादों की साक्षी है। इस मार्मिक संस्मरण में एक बेटी अपनी स्मृतियों के सहारे उस खाली कुर्सी में आज भी अपने पापा की मुस्कुराती हुई छवि देखती है। यह कहानी हर उस व्यक्ति के दिल को छू जाएगी, जिसने अपने पिता को खोया है या उनकी यादों को संजोए रखा है।

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“मौन दरिया, बोलती रात”

यह कविता एक गहरे आत्ममंथन का चित्रण है, जिसमें कवि अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की जद्दोजहद से गुजर रहा है। वह सोचता है कि आखिर क्या कहे, किससे कहे और कितना कहे, क्योंकि कहने की भाषा तक मौन हो चुकी है। जीवन में ऐसा सन्नाटा है जहाँ शरीर के अंग सुन्न पड़ चुके हैं और चारों ओर उदासीनता छाई है। कवि प्रश्न उठाता है कि किसके पास कितना “पानी” बचा है और किसे उसकी परवाह है। हर कोई अपनी ही धुन में, अपने ही राग में व्यस्त है। जीवन बस एक बहती हुई धारा की तरह है, जो मौन रहते हुए भी अपनी कहानी कहती जाती है।
दरिया का सन्नाटा भी मानो संदेश देता है कि कहीं ठहरना मत, आगे बढ़ते रहना। इस अंतर्द्वंद्व में कवि सोचता है कि दरिया से भी आखिर क्या कहा जाए, क्योंकि यहाँ तो भाषा भी मौन है और कोई किसी का नहीं है

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मन का अंतरिक्ष… 

यह अंश गहन रूपकों के माध्यम से मन के भीतर उमड़ते भावों और उनके क्रमिक शांत होने की प्रक्रिया को दर्शाता है।
मन के अंतरिक्ष में उल्काओं की तरह तीव्र वेग से बहते विचार और भावनाएँ कई बार टकराव और घर्षण की स्थिति पैदा करते हैं, लेकिन समय के साथ उनकी गति धीमी पड़ जाती है। यह ठीक वैसे ही है जैसे पहाड़ों और घाटियों को चीरती कोई नदी, समतल पर आकर शांत और स्निग्ध हो जाती है।
अंत में, यह रूपक जीवन के उस क्षण से जुड़ता है जब उत्साह और उमंग से भरी नई नवेली दुल्हन, अपने ही आंगन में चुपचाप प्राजक्त के फूल-सी कोमलता के साथ ठहर जाती है और भीतर गहरी शांति महसूस करती है।

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पुश्तैनी घर

पुश्तैनी घर ईंट-पत्थर नहीं होते, वे पीढ़ियों की साँसें सँजोए रहते हैं। उनकी दीवारों में हँसी की गूँज, डाँट की तपिश और रिश्तों की गर्माहट कैद रहती है। जब हम उन्हें छोड़ देते हैं, वे धीरे-धीरे खंडहर नहीं, मौन पीड़ा में बदलते हैं जीते-जी मरते हुए।

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मोती जैसे महुआ

भोर की नर्म रोशनी में पेड़ों से टपकते महुआ के फूल, मानो धरती पर बिखरते मोती हों — यही है इस कविता का मूल दृश्य। “मोती जैसे महुआ” में बाल-सुलभ जिज्ञासा और प्रकृति की सादगी का संगम है। दादी की डलिया, महुआ की सोंधी ख़ुशबू और उस क्षण की नीरवता — सब मिलकर एक ऐसे ग्रामीण सौंदर्य को रचते हैं, जहाँ हर फूल जीवन की मिठास और श्रम की सुगंध से भरा है।

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कार्यशाला में शामिल विद्यार्थी और विशेषज्ञ, सांस्कृतिक विरासत संरक्षण पर चर्चा करते हुए।

हेरिटेज से शिक्षा का संगम

राजकीय महाविद्यालय पनारसा में आयोजित 7 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का उद्देश्य विद्यार्थियों को सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूक करना है। कार्यक्रम में भारत सहित कई देशों के प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं।

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