काली राख की बस्ती

कभी-कभी कोई दर्दनाक घटना सुनने भर से ही दिल काँप जाता है। पर जब ऐसा पता चलता है कि वह दर्द किसी ऐसे इंसान के साथ हुआ है जिसे हम रोज़ देखते थे, जिसके बच्चे हमारे सामने खेलते थे,

गुरप्रीत कौर, प्रसिद्ध लेखिका, बठिंडा

कभी-कभी कोई दर्दनाक घटना सुनने भर से ही दिल काँप जाता है। पर जब ऐसा पता चलता है कि वह दर्द किसी ऐसे इंसान के साथ हुआ है जिसे हम रोज़ देखते थे, जिसके बच्चे हमारे सामने खेलते थे, जो हमारी यादों का हिस्सा था – तो वह दुख कई गुना बढ़ जाता है। मेरे लिए विजय अंकल और उनका परिवार ऐसी ही एक याद है, जो आज भी दिल को चीर जाती है।
जब हम बठिंडा में रहते थे, हमारे घर के ठीक सामने एक छोटी-सी कच्ची झोपड़ी थी। उसी में विजय अंकल अपनी पत्नी और दो छोटे बच्चों के साथ रहते थे। झोपड़ी बहुत साधारण थी टूटी-फूटी दीवारें, टीन की छत और एक छोटा-सा आँगन, जिसमें दो-तीन पुराने बर्तन और कुछ लकड़ियाँ पड़ी रहती थीं।
अंकल रोज़ मेहनत-मजदूरी करते थे। कभी फैक्ट्री, कभी खेत, तो कभी किसी घर में छोटा-मोटा काम। उनका जीवन रोज़ की जद्दोजहद से भरा था। आंटी बहुत दुबली-पतली थीं – इतनी पतली कि जैसे हवा से उड़ जाएँ। चेहरे पर थकान साफ दिखती थी, लेकिन फिर भी वह हमेशा बच्चों को गोद में लेकर मुस्कुराने की कोशिश करती थीं।
उनका तीन साल का बेटा कम बोलता था, पर प्यारा और शांत स्वभाव का था। उसके हाथ में एक बड़ी-सी गाँठ थी। डॉक्टरों ने कहा था कि वह अभी छोटा है, इसलिए ऑपरेशन छह साल की उम्र में ही हो सकेगा। वह बच्चा हमें अक्सर घर के सामने मिट्टी में खेलता दिख जाता था।
आंटी की गोद में दूसरी बच्ची थी -बिल्कुल नन्ही, मासूम, दूध पीने वाली। चमकीली आँखें, पर कमजोर शरीर। गरीबी जैसे उस
परिवार की हर साँस में घुली हुई थी।

हमारा पूरा इलाका एन.एफ.एल. फैक्ट्री से उड़ने वाली काली राख से ढका रहता था। रोज़ सुबह दरवाज़ा खोलते ही जमीन पर राख की परत जमी मिलती। थोड़ी सी हवा चलती, तो पूरा घर काले धुएँ जैसा हो जाता। माँ दिन में कई बार झाड़ू-पोंछा करतीं, लेकिन आधे घंटे में सब फिर काला पड़ जाता।
जहाँ पानी का तालाब होना चाहिए था, वहाँ काली झीलें थीं – गाढ़ी, भारी राख से भरी। इन्हें “काली झीलें” इसलिए कहा जाता था क्योंकि उनकी सतह पर एक मोटी काली परत तैरती रहती थी। सरकार ने इन्हीं झीलों के पास गरीबों को थोड़ी-बहुत जमीन रहने के लिए दे दी थी।
विजय अंकल भी धीरे-धीरे अपनी झोपड़ी से वहाँ चले गए और काली राख के बीच एक छोटा-सा कमरा बनाकर रहने लगे।

जब पापा का ट्रांसफर गुजरात हुआ, हम बठिंडा छोड़कर चले गए। कई साल हम वहीं रहे और पुरानी कॉलोनी की खबरें कम ही मिलती थीं। माँ कभी-कभार घर देखने जातीं, लेकिन मैं लंबे समय तक नहीं गया।
समय धीरे-धीरे गुजर गया। बचपन की यादें धुंधली पड़ने लगीं, पर सामने वाली झोपड़ी और उस गरीब परिवार की तस्वीर आज भी दिल में बसी रही।
एक दिन अचानक मुझे याद आया – “विजय अंकल कहाँ हैं? उनकी झोपड़ी में अब कोई और क्यों रहता है?”
मैंने माँ से पूछा,
“मम्मी, जो सामने रहते थे विजय अंकल… वो कहाँ गए? इतने साल बाद भी उनका कुछ पता क्यों नहीं?”
माँ ने गंभीर होते हुए कहा -“उनके साथ बहुत बुरा हुआ था… बहुत ही बुरा। इसलिए वे बठिंडा छोड़कर बिहार चले गए।”
मैं चौंक गया। क्या हुआ था? आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक पूरा परिवार अपना घर, अपनी यादें, अपना सब कुछ छोड़
गया?

माँ ने धीरे-धीरे वह दर्दनाक कहानी सुनाई – एक ऐसी घटना जिसने उस परिवार की पूरी दुनिया उजाड़ दी थी।
एक दिन उनकी छोटी-सी बेटी, जो तब भी पंद्रह साल की थी, सुबह शौच के लिए काली झीलों के पास गई। उनके पास अपना शौचालय नहीं था – गरीबी की एक और मजबूरी।
झीलों के किनारे कुछ लड़के घूम रहे थे। उन्होंने उस मासूम बच्ची को अकेले देखा और अपनी हैवानियत दिखाते हुए उसका बलात्कार कर दिया। वह बच्ची बेहोश हो गई। जब उसे होश आया तो वह किसी तरह लड़खड़ाती हुई घर वापस पहुँची और रोते हुए अपने पिता को सब बता दिया।माँ का यह वाक्य सुनते ही जैसे मेरा दिल रुक सा गया। इतनी छोटी बच्ची… इतना बड़ा जख्म…विजय अंकल का चेहरा मेरी आँखों में घूम गया – वह शांत, मेहनती आदमी, जो अपने बच्चों के लिए दिन-रात मेहनत करता था – उसकी दुनिया एक पल में बिखर गई थी। उसी समय वह पुलिस स्टेशन गए। रिपोर्ट लिखवाई। पुलिस ने कार्रवाई की। आरोपी लड़के पकड़े गए और उन्हें सजा भी मिली।
लेकिन जिस परिवार की आत्मा टूट चुकी हो, उसके लिए न्याय भी कभी-कभी कम पड़ जाता है।

इस घटना के बाद वह परिवार उस जगह पर रुक ही नहीं पाया। जहाँ यह अत्याचार हुआ, जहाँ हर गली, हर दीवार उन्हें उस भयावह दिन की याद दिलाती थी – वहाँ रह पाना असंभव था।
समाज की बातें, लोगों की नज़रें, बच्ची का मनोवैज्ञानिक घाव – सभी ने मिलकर उस परिवार को अंदर तक हिला दिया था।
कुछ महीने बाद उन्होंने अपना छोटा-सा कमरा, अपनी मेहनत, अपना सब छोड़ दिया और चुपचाप बठिंडा से बिहार चले गए।
वे जो थोड़ा-बहुत था वह समेटकर चले गए – दर्द, मजबूरी और टूटे सपनों को साथ लेकर।

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