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उम्र के अनुसार कितनी देर चलना चाहिए? पूरी गाइड

हर उम्र की वॉकिंग डोज़

लना हर उम्र के लिए फायदेमंद है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि अलग-अलग आयु वर्ग के लिए वॉकिंग का समय अलग होता है? बच्चों को 60 मिनट, युवाओं को 30–45 मिनट और वरिष्ठ नागरिकों को 20–30 मिनट की वॉक की सलाह दी जाती है। सही अवधि में नियमित वॉक हृदय स्वास्थ्य, वजन नियंत्रण और मानसिक संतुलन के लिए बेहद जरूरी है।

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पुणे में जमीन निवेश के नाम पर 2.40 करोड़ की ठगी, रिटायर्ड एसीपी समेत 5 पर केस

जमीन निवेश के नाम पर 2.40 करोड़ की ठगी

पुणे में जमीन निवेश के नाम पर 2.40 करोड़ रुपये की ठगी का मामला सामने आया है, जिसमें रिटायर्ड एसीपी सहित 5 लोगों पर केस दर्ज किया गया है. आरोपियों ने मुनाफे का झांसा देकर पैसे लिए और शिकायतकर्ता को धमकाया.

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महाशिवरात्रि के दौरान बंद भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर

महाशिवरात्रि पर भीमाशंकर मंदिर रहेगा बंद

महाशिवरात्रि 2026 के दौरान श्री क्षेत्र भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर भक्तों के लिए बंद रहेगा. नए भव्य सभामंडप, सीढ़ी मार्ग और परिसर विकास कार्यों के चलते सुरक्षा कारणों से जिला प्रशासन ने यह निर्णय लिया है. 12 से 18 फरवरी तक मंदिर में दर्शन संभव नहीं होंगे.

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गांव के आंगन में एक लड़की चाय का कप पकड़े, सामने भावुक खड़ा एक युवक, हल्की धूप और भावनात्मक माहौल

अधूरी चाय, अधूरा इश्क़

चाय को ना नहीं बोलते साहब, पाप लगता है…” — और इस मासूम से वाक्य ने मोहित की ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। वर्षों बाद जब वही चाय की खुशबू और वही बात एक नन्हीं बच्ची ने दोहराई, तो अधूरी कहानी को एक नया अंत मिल गया।

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मैं हिंदी बोल रही हूँ

हिंदी ने वर्षों से भारतीय संस्कृति, साहित्य और जनजीवन में गहरी जड़ें जमा रखी हैं। यह अपने देश में राजभाषा के रूप में पूर्ण सम्मान की आकांक्षा रखती है। विदेशी विश्वविद्यालयों और विश्व हिंदी सम्मेलनों में इसका सम्मान है, मगर अपने देश में इसे संवैधानिक रूप से राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया गया। यह पाठ हिंदी के गौरव, संघर्ष और उसके महत्व को बखूबी उजागर करता है।

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महंगाई और आर्थिक संघर्ष से जूझते भारतीय मध्यमवर्ग को दर्शाती व्यंग्य कविता की यथार्थवादी छवि।

एक मध्यमवर्गीय की दास्तान

“एक मध्यमवर्गीय की दास्तान” भारतीय मध्यमवर्ग के संघर्ष, महंगाई और बदलते सामाजिक परिवेश पर तीखा लेकिन संवेदनशील व्यंग्य प्रस्तुत करती है। कविता में सोना, रोजमर्रा की जरूरतें और आधुनिक जीवनशैली के बीच पिसते आम इंसान की स्थिति को प्रभावशाली ढंग से उकेरा गया है।

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रेगिस्तान में खड़ी एक लड़की के पीछे नागफनी का पौधा, समाज में बेटियों के दर्द का प्रतीकात्मक दृश्य

नागफनी सी बेटियां !

यह कविता बेटियों के प्रति समाज में मौजूद भेदभाव और उपेक्षा की मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत करती है। नागफनी के प्रतीक के माध्यम से दिखाया गया है कि प्रेम और स्वीकार्यता से वंचित लड़कियां भीतर से कोमल होते हुए भी परिस्थितियों के कारण कठोर बन जाती हैं।

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हलफनामा

पुरुष ने बड़ी कुशलता से मिट्टी और स्त्री में बीज बोने के अधिकार अपने अधीन कर लिए। उसने सब कुछ नियंत्रित किया, जिसमें स्त्री के मस्तिष्क का एक छोटा सा कोना भी शामिल था। दिखावे की रंगीन दुनिया में उसने बड़ी सफाई से अपना भार स्त्री के कंधे पर डाल दिया।

अब, जब स्त्रियों ने पुरुष सत्ता-कमान को कुशलता से संभाल लिया है, पुरुष तुरंत नए आदर्श स्थापित करने में जुट गया। अपराध भाव और जकड़न की स्थिति में विद्रोह की लौ को स्त्रियों ने सहजता से दबा दिया। यह धीरे-धीरे एक नए हलफनामे में तब्दील हो रहा है, जो बदलाव और संतुलन की दिशा में संकेत देता है।

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कागज़ की कश्ती

कविता बचपन की उन मीठी यादों को जीवंत करती है जब बारिश में “कागज़ की कश्ती” सपनों का प्रतीक बन जाती थी। न चिंता थी, न भय—बस मासूमियत और आनंद था। अब वक्त बदल गया है; बारिश, दोस्त और वो बचपन सब पीछे छूट गए हैं। “कागज़ की कश्ती” आज सिर्फ उन सुनहरे दिनों की प्यारी याद बनकर रह गई है।

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A warm Indian family sitting together inside a cozy home in the evening, soft lighting, calm smiles, and a sense of love, belonging, and emotional comfort reflecting the true meaning of home.

आशियाना

घर केवल चार दीवारों का नाम नहीं, बल्कि रिश्तों, यादों और प्रेम से बना एक ऐसा आशियाना है जहाँ सुकून और अपनापन मिलता है। यह कविता घर के भीतर बसने वाली भावनाओं और रिश्तों की सच्चाई को सरल शब्दों में बयाँ करती है।

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