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विधवाओं की दशा पर केंद्रित स्मारिका का लोकार्पण

इंदौर में महिला जागृति अभियान की पाँचवीं वर्षगांठ पर हुआ आयोजन

प्रसिद्ध साहित्यकार हेमा म्हस्के की रिपोर्ट

इंदौर-महिला जागृति अभियान की पाँचवीं वर्षगांठ के अवसर पर इंदौर में आयोजित एक भव्य समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार अरुणा खरगोनकर द्वारा संपादित विधवाओं की दशा पर केंद्रित स्मारिका का लोकार्पण किया गया. आयोजन विचार प्रवाह साहित्य मंच के तत्वावधान में इंदौर प्रेस क्लब स्थित एक रेस्तरां के सभागार में हुआ, जहाँ बड़ी संख्या में महिलाएँ उपस्थित थीं.कार्यक्रम का शुभारंभ महाराष्ट्र में विधवा प्रथा उन्मूलन आंदोलन के जनक प्रमोद झिंझड़े, वरिष्ठ पत्रकार व समाजकर्मी प्रसून लतांत, इंदौर प्रेस क्लब के मुकेश तिवारी, विचार प्रवाह साहित्य मंच की अध्यक्ष सुषमा दुबे और समाज चिंतक मनीष खरगोनकर ने संयुक्त रूप से किया.
वरिष्ठ साहित्यकार अरुणा खरगोनकर ने बताया कि यह स्मारिका सिर्फ कविताओं या कहानियों का संकलन भर नहीं है, बल्कि यह समाज में व्याप्त उस लंबी चुप्पी को तोड़ने का प्रयास है जो साहित्य, फिल्म और कला के क्षेत्रों में विधवाओं की स्थिति पर दिखाई देती है. उन्होंने कहा कि यह स्मारिका उन सभी महिलाओं को समर्पित है जिन्होंने वैधव्य, संतानहीनता या सामाजिक-धार्मिक भेदभाव के कारण अपमान और प्रताड़ना का सामना किया है.
स्मारिका के प्रकाशन के पूर्व अरुणाजी ने एक प्रश्नावली तैयार कर ग्रामीण और शहरी समाज से जुड़े 50 से अधिक स्त्री-पुरुषों से जवाब प्राप्त किए. इनमें कई अशिक्षित महिलाएँ भी शामिल थीं, जिन्होंने मौखिक रूप से अपने विचार साझा किए. इन जवाबों का निचोड़ यह रहा कि विधवा और सधवा में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए और ङ्गङ्घजब विधुर अशुभ नहीं, तो विधवा अशुभ कैसेफफ जैसे सवालों पर समाज को गहन चिंतन करना चाहिए.स्मारिका में राधिका इंगले, स्वाति धर्माधिकारी, लतिका पानसारे, अमिता मराठे, वर्षा तारे, अलकनंदा साने, अर्चना पंडित, निर्मला कर्ण, गीता चौबे, वैजयंती दाते, निशा बुधेझा, नीला कारंबेलकर, डॉ. सुनीता फडनीस, कल्पना माकोदे, अनीता मिश्रा सिद्धि, सरला मेहता, सुनीता गदाले, प्रिया वरुण तारे, सीमा और इंदु शर्मा जैसी महिलाओं के विचार प्रमुखता से शामिल किए गए हैं.
महाराष्ट्र से आए प्रमोद झिंझड़े ने अपने संबोधन में कहा कि देशभर में विधवाओं के हित में एक केंद्रीय कानून बनाने की आवश्यकता है और इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर कानूनविदों की समिति गठित करने की प्रक्रिया चल रही है.प्रसून लतांत ने कहा कि विधवा की समस्या गंभीर होने के बावजूद अदृश्य बनी रहती है. समाज इसे अपरिवर्तनशील मानकर बदलाव की दिशा में कदम उठाने से हिचकता है.कार्यक्रम में मुकेश तिवारी, सुषमा दुबे, वामन बाबले, शीला और अश्विन खरे ने भी विचार व्यक्त किए और महिलाओं का हौसला बढ़ाया.अरुणा खरगोनकर ने अपने संबोधन में ईश्वरचंद्र विद्यासागर, राजा राममोहन राय, महर्षि बर्वे और डॉ. भीमराव आंबेडकर के योगदान को स्मरण किया. उन्होंने कहा कि आज महिलाएँ हर क्षेत्र में अग्रणी हैं और सर्वोच्च पदों पर पहुँच चुकी हैं, लेकिन एक सामान्य विधवा अब भी अन्याय, शोषण और वर्जनाओं का सामना करने के लिए विवश है.
उन्होंने ग्रामीण महिलाओं की स्थिति को और भी अधिक चिंताजनक बताया जहाँ संपत्ति से बेदखल करना, टोना-टोटका और डायन-चुड़ैल के आरोप लगाना, मारपीट कर गाँव से निकाल देना जैसी घटनाएँ आम हैं.उन्होंने कहा कि महिलाओं को संगठित होकर विधवाओं के समर्थन में खड़ा होना होगा, क्योंकि जो लोग और महिलाएँ उन्हें कष्ट पहुँचाते हैं, वे संगठित रहते हैं जबकि विधवा अकेली पड़ जाती है. समाज का तटस्थ और उदासीन रवैया भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है.कार्यक्रम का कुशल संचालन आरती दुबे ने किया.

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