जन्मदिन पर परिवार के साथ खुश बच्चा, संस्कार और सादगी का संदेश

जन्मदिन की सौगात

यह बाल कविता जन्मदिन के उत्सव को केवल केक और उपहारों तक सीमित न रखकर, उसे संस्कार, सेवा और करुणा से जोड़ती है। पेड़ लगाना, पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम, बड़ों का सम्मान और सादगीपूर्ण जीवन जैसे मूल्य इस रचना को बच्चों के लिए शिक्षाप्रद और प्रेरक बनाते हैं।

Read More

शक्ति हो माँ

माँ, तुम ममता की मूर्ति हो, धीरज और करुणा का अथाह सागर। तुम्हारे आगे शब्द भी छोटे पड़ जाते हैं। आकाश तुम्हें नमन करता है और धरती तुम्हारी आरती उतारती है। जीवन के हर सुख-दुख में तुम्हारा हाथ थाम लेने से मन को संबल मिलता है। मेरी प्रत्येक साँस तुम्हारी ही देन है, हर क्षण तुम्हारे ध्यान में ही बीतता है।

जब-जब मन डगमगाता है, आँखों में तुम्हारा रूप बसाकर स्थिरता मिलती है। तुम्हारे चरणों में सिर झुकाना ही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है। अंतिम क्षणों में भी यदि तुम्हारे दर्शन मिल जाएँ तो जीवन सार्थक हो जाएगा।

Read More
बेटे का इंतजार करती मां की भावुक और प्यार भरी यादें –

जिसने अक्षर नहीं, जीवन पढ़ाः मेरी मां

बाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर जीवन की भाषा उन्हें पूरी तरह आती थी। बचपन की जिम्मेदारियों ने उन्हें समय से पहले माँ बना दिया। स्वाभिमान उनकी साँसों में था और ममता उनके कर्मों में। टूटकर भी न बिखरने वाली इस स्त्री ने चुपचाप पूरा घर थामे रखा और अंत में, हरी रेखाओं के बीच, अपने होने का आख़िरी संकेत दे गई।

Read More
पेड़ के नीचे ध्यान में बैठा व्यक्ति और सामने प्रकाश रूप में प्रकट चेतना, आत्मसंवाद और आंतरिक शांति का प्रतीक

चेतना और मनुष्य का संवाद

यह रचना मनुष्य और उसकी चेतना के बीच एक गहन संवाद को प्रस्तुत करती है, जहाँ आत्ममंथन, मोह, विरक्ति और जीवन के सत्य पर गंभीर प्रश्न उठते हैं। यह केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि भीतर की यात्रा है, जो व्यक्ति को स्वयं से साक्षात्कार की ओर ले जाती है।

Read More

दीवार

कहानी एक सफल लेकिन अकेले हो चुके इंसान— रविन्द्र के दर्द को दिखाती है। महंगे बंगले, नाम, शोहरत और पैसा होने के बावजूद वह अंदर से टूट चुका है, क्योंकि उसकी माँ अब नहीं रही। उसने माँ से वादा किया था कि उसे हर सुख देगा, पर उसी “बड़े मकान की दीवारों” ने बेटे और माँ के बीच दूरी बना दी। माँ शायद आख़िरी वक़्त में दर्द में थी, पर रविन्द्र को पता न चला क्योंकि “दीवारों” ने आवाज़ और अहसास रोक लिए।रविन्द्र आज पछता रहा है कि असली घर प्यार और साथ से बनता है, दीवारों से नहीं।यही दर्द और पछतावा पूरी कहानी का मूल है।

Read More
हरा-भरा पेड़ जिसकी शाखाओं पर पक्षी बसेरा किए हुए हैं

मैं प्रकृति हूँ

“प्रकृति स्वयं कहती है—मैं ही इस धरती की शोभा हूँ, जीवन का मूल आधार हूँ। मेरी कोमल शाखाएँ, मेरी छाया, मेरे फूल-पत्ते सभी जीवों के लिए आश्रय और सहारा हैं। जब कोई निराश होता है, मैं उसे आशा देती हूँ; जब कोई भूखा-प्यासा होता है, मैं उसकी भूख-प्यास मिटाती हूँ।

Read More

असुंदर है

*“असुंदर है”* समाज के विकृत चेहरों को उजागर करने वाली रचना है। कवि ने इस कविता में बार-बार “असुंदर है” कहकर हमारे भीतर और हमारे समाज में फैली उन कुरूप सच्चाइयों की ओर ध्यान दिलाया है, जिन्हें हम सामान्य मानकर अनदेखा करते रहते हैं।
कवि कहता है कि असुंदर है जब मनुष्य, मनुष्य के साथ भेदभाव करता है — किसी को महान और किसी को तुच्छ समझता है। यह असुंदर है जब पुरुष को मोक्ष का अधिकारी माना जाता है और स्त्री को पैरों की जूती समझा जाता है। असुंदर है जब पत्थरों को ईश्वर कहा जाता है, लेकिन मनुष्यों के साथ पशुओं जैसा व्यवहार किया जाता है।
गाँव के बीच मंदिर बनाना और कुछ लोगों को गाँव के बाहर बसाना भी असुंदर है। पत्थरों की पूजा करते हुए उन्हीं पर पशुओं की बलि चढ़ाना और जाति-धर्म के नाम पर लोगों को बाँटकर आपस में लड़ाना भी असुंदर है।

Read More

संतोष कुमार झा का कविता संग्रह “स्याही का सिपाही”

हिंदी दिवस के अवसर पर गांधीनगर, गुजरात में आयोजित 5वें अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन के दौरान कोंकण रेलवे कॉर्पोरेशन लिमिटेड (केआरसीएल) के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक संतोष कुमार झा के चौथे काव्य संग्रह “स्याही का सिपाही” का विमोचन किया गया। पुस्तक का विमोचन भारत सरकार के केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, राज्यसभा सांसद डॉ. दिनेश शर्मा, वैज्ञानिक डॉ. आनंद रंगनाथन और भारत सरकार की सचिव (राजभाषा) श्रीमती अंशुलि आर्या द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।

Read More

तुलसीदास: एक ताने ने जिसे बना दिया युगों का संत

भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना में जब भी भक्ति और आध्यात्मिक साहित्य की बात होती है, गोस्वामी तुलसीदास का नाम श्रद्धा और गौरव के साथ लिया जाता है. वे न केवल एक संत, एक कवि और एक भक्त थे, बल्कि आध्यात्मिक क्षेत्र के ऐसे युगपुरुष भी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं से भारतीय समाज की आत्मा को गहराई से स्पर्श किया.
लगभग 500 वर्ष पूर्व भारत में मुगल शासन की नींव पड़ चुकी थी. इसी काल में उत्तरप्रदेश के बांदा ज़िले के ग्राम राजापुर में रामबोला नामक बालक का जन्म हुआ.

Read More