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पुराना डाक बंगला और उसके बरामदे से बदलते कस्बे की कहानी

36 शख्स… 36 कहानियां

एक बूढ़ा डाक बंगला अपनी आंखों से देखे कस्बे के बदलते समय, लोगों, रिश्तों और भूली-बिसरी यादों की खट्टी-मीठी कहानियां सुनाता है. पढ़िए 36 शख्स… 36 कहानियां.

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“कभी खुद के लिए भी जी ले माँ…”

जाने हमेशा ऐसा क्यों लगता है सारे असंभव काम आप ही कर सकती हो… जादुई सी बेतरतीब से बंधे माँ के जूडे से हमेशा बाल की एक पतली सी लट छूट जाया करती थी, जो पसीने से गर्दन में चिपकी रहती। इतनी गर्मी में रोटियां बनाते हुए माँ पसीने से नहा उठती। सब काम निपटा…

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देवरी स्थित धुकेश्वरी मंदिर सभागृह में आयोजित राज्यस्तरीय सम्मान समारोह में कवयित्री मेघा मनोज अग्रवाल को नारी रत्न सम्मान प्रदान करते संस्था के संस्थापक डॉ. घनश्याम निखाड़े, साथ में मंचासीन अतिथि और उपस्थित गणमान्यजन।

मेघा अग्रवाल का नाम राज्य में रोशन

नागपुर की प्रतिष्ठित कवयित्री मेघा मनोज अग्रवाल को समाजसेवा, हिंदी लेखन और उनकी बहुमुखी प्रतिभा के लिए राज्यस्तरीय नारी रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया। यह सम्मान श्याम बहुउद्देशीय विकास संस्था की ओर से देवरी में आयोजित भव्य समारोह में संस्था के संस्थापक डॉ. घनश्याम निखाड़े द्वारा प्रदान किया गया। इस उपलब्धि से नागपुर का नाम गौरवान्वित हुआ है।

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अपने परिवार के साथ खड़े एक स्नेही और संघर्षशील भारतीय पिता का भावपूर्ण दृश्य, जो प्रेम, त्याग, सुरक्षा और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक है।

पिता का प्रेम

पिता केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि परिवार की नींव, विश्वास का स्तंभ और त्याग का दूसरा नाम हैं। प्रस्तुत है पिता के प्रेम, संघर्ष और समर्पण को समर्पित एक हृदयस्पर्शी कविता।

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अमलतास के सुनहरे फूलों से भरे जंगल में पीले घाघरे पहने रंगरेजन का जादुई और प्रकृतिमय दृश्य।

रंगरेजन

अमलतास के सुनहरे फूलों से भरे जंगल में रहने वाली कारीगर रंगरेजन की यह लघुकथा प्रेम, प्रकृति और रंगों के अद्भुत संबंध को उजागर करती है। एक जादुई घाघरा और अमलतास के बीजों के माध्यम से कहानी जीवन में प्रेम और हरियाली बोने का संदेश देती है।

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टूटता मानव…

मनुष्य आज अपने ही भीतर टूट रहा है। बिना वजह झगड़े पर आमादा है, जबकि जीने की जद्दोजहद पहले से ही कठिन है। कोई शराब और सिगरेट जैसे नशों में डूबा है, कोई जीवन की खुशियाँ खोकर केवल मरने की प्रतीक्षा कर रहा है।

वह अपने दिल में सिर्फ़ दर्द सँजोए बैठा है और खुद को ही ठुकराता जा रहा है। प्यार के रिश्तों में भी उसे छलावा और धोखा मिलता है, जिससे वह गुनहगार-सा महसूस करता है। समाज में झूठ और धोखे का बोलबाला है, सच्चाई का कोई रखवाला नहीं। ऐसे में आदमी सिर्फ़ होशियार होना सीख गया है, संवेदनाएँ खो बैठा है और संघर्षों में हारकर रोने पर मजबूर है।

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दयानंद महाविद्यालय में हिंदी उत्सव

19 सितंबर 2025 को दयानंद कला महाविद्यालय, लातूर में हिंदी दिवस बड़े उत्साह और गरिमा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर हिंदी विभाग ने “नवचेतना” हिंदी साहित्य मंडल की स्थापना की, जो विद्यार्थियों को रचनात्मक अभिव्यक्ति का मंच देगा। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और महर्षि दयानंद सरस्वती की प्रतिमा वंदना से हुआ। मुख्य अतिथि श्री बजरंग पारिख ने हिंदी भाषा की महत्ता और वर्तमान समाज में इसकी प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा की। प्रधानाचार्य डॉ. शिवाजी गायकवाड़ ने कहा कि हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और आत्मा की अभिव्यक्ति है। छात्रों ने भावनात्मक और प्रेरणात्मक कविताएँ प्रस्तुत कीं और हिंदी के प्रति अपने कर्तव्यों का संकल्प लिया।

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यमुना तट पर खड़े भगवान कृष्ण और उनके सम्मुख नतमस्तक भक्त का भावपूर्ण दृश्य, जो भक्ति और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है.

कान्हा, मुझे मीरा ही बना लेना

यह कविता कृष्ण-प्रेम की परंपरा में समर्पण, भक्ति और निस्वार्थ प्रेम की एक अंतर्यात्रा है. इसमें राधा और मीरा के प्रतीकों के माध्यम से आत्मा का ईश्वर से संवाद रचा गया है. प्रेम यहाँ भय से परे, सामाजिक रिवाजों से टकराता हुआ भी अडिग रहता है. जब प्रेम का अधिकार न मिले, तब दर्शन, और अंततः स्वयं को बाँसुरी बना देने की चाह यह रचना उसी परम समर्पण की अभिव्यक्ति है.

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डायरी पर लिखी हिंदी ग़ज़ल के पन्नों पर गिरते आँसू, रात की हल्की रोशनी में भावुक माहौल

आँसुओं का हिसाब रखे ज़माना हुआ…

यह ग़ज़ल इश्क़ की तड़प, जज़्बातों के छल और सत्ता की विडंबना को एक साथ समेटती है। शमा, परवाना, कफ़न और मयखाने जैसे प्रतीकों के माध्यम से कवि ने दर्द और दौर-ए-वक़्त का सटीक चित्र खींचा है।

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महिदपुर रोड के बाजार में दुकान के बाहर रखी पारंपरिक कुर्सी का दृश्य

कुर्सी का किस्सा: यादों में बसती एक परंपरा

महिदपुर रोड के बाजार में दुकानों के बाहर रखी एक साधारण कुर्सी कभी व्यापार की एक अनोखी परंपरा का प्रतीक हुआ करती थी। यह कुर्सी बताती थी कि दुकान की ‘बोनी’ हुई है या नहीं, और इसी के साथ जुड़ी थी आपसी समझ, अपनापन और बाजार की अनकही भाषा। आज भले ही समय बदल गया हो, लेकिन यह कुर्सी अब भी उन सुनहरी यादों को जीवित रखे हुए है।

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