
निरुपमा सिंह,प्रसिद्ध साहित्यकार, बिजनौर (उ.प्र.)
मुझसे ही ये धरा सुशोभित
मैं ही इसका सिरमौर मुकुट
धन्य हो जीवन मेरा
धन्य हो ये अवनी भी
काम यदि किसी के आऊँ
संग-संग मैं भी मुस्काऊँ
यदि बेआसरा देखूं कोई
आसरा मैं बन जाऊँ
सभी जीव जन्तुओं की
अपनी कोमल पत्तियों से
भूख, प्यास मैं मिटाऊँ
क्योंकि मैं प्रकृति हूँ
इस जग में मिले
सभी को आसरा
मेरी शाखाओं पर करें बसेरा
जब तक है सृष्टि
धन्य हो जाए जीवन सारा
हे मानव तुम हरित क्रांति ले आओ
एक एक वृक्षारोपण का संकल्प उठाओ।।

सुंदर
बहुत सुंदर कविता
अद्भुत 🙏
बहुत सुंदर लिखा 😍😍
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– सुरेश परिहार