हर सदा जो उठी थी, खामोश रह गई,
बेताल्लुक इस जहाँ में कोई सहर नहीं हुई।
बेज़ुबान बेटियाँ चीख-चीख कर कह गईं,
पर इन कानों को कभी कोई ख़बर नहीं हुई।
दिल की दरारों में न जाने कितनी बसी थी सिसकियाँ,
पर ज़माने के दस्तक से,कोई बहर नहीं हुई।
इस बेक़स दौर में, उम्मीदें भी बिखर गईं,
हर उम्मीद के चमन में कोई फसल नहीं हुई।
दर्द ने घेरा है हर तरफ़ से मगर,
इस कड़वी ज़िंदगी में कोई ज़हर नहीं हुई।
हर आँसू को गिरने दिया,बेजान चेहरे पे,
पर ये सूखी ज़मीं कभी नमी से तर बतर नहीं हुई।
वो दर्द जो दिलों में, गूंजता रहा सदा,
इस सुनसान सफ़र की कोई डगर नहीं हुई।
हर चीख़ पर सन्नाटा था, कोई जवाब नहीं,
इस अंधेरी रात की कभी कोई पहर नहीं हुई।
पलकों पर जो बैठे थे सारे वो ख्वाब टूट गए,
आँखें थी उसकी आंसुओं का दरिया,मगर समन्दर नहीं हुई
बेटियों के दर्द से, हर दिल पत्थर बना,
पर पत्थरों के शहर में कोई हक़ीक़त बसर नहीं हुई।

कृतिका कृति, प्रसिद्ध लेखिका, कानपुर
