मैं हूं सूखी लकड़ी..

मैं सूखी लकड़ी हूं, जीवन में हितकारी और हर रूप में कल्याण फैलाने वाली। मैं शिव के मस्तक पर सजती हूं, कृष्ण की बांसुरी की तान में झूलती हूं, घरों में झूले और पलनों का आधार बनती हूं, और रोगियों का उपचार भी करती हूं। हर कदम पर मेरी उपस्थिति है—सृष्टि, श्रद्धा और जीवन के हर पहलू में। यही मेरी शक्ति और पहचान है।

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बन्द

झुग्गी-झोपड़ी में शिक्षा का दीप जगाने का हमारा छोटा-सा मिशन पूरे जोश में था। नन्हे-मुन्नों के लिए चॉक-स्लेट और कुछ बिस्कुट लेकर मैं घर से निकला तो चेहरे पर मुस्कान तैर रही थी। कारण भी था—कल मेरे अग्रज द्वारा आयोजित बन्द पूरी तरह सफल रहा था। अख़बारों के पन्ने उसी खबर से सजे थे और घर का माहौल सुबह से उसी चर्चा में डूबा था।

अपने परिचित क्षेत्र में पहुँचा तो नज़र नन्हें ननकू पर टिक गई। वह सूनी सड़क को टकटकी लगाए देखे जा रहा था।
“अरे ननकू! क्या देख रहे हो? चलो, पढ़ाई का समय हो गया है।” मैंने पुकारा।ननकू ने बिना आँखें हटाए धीमे स्वर में कहा—
“हमका भूख लागल बा।”

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एक प्रतीक्षा…

यह कविता जीवन में प्रतीक्षा की गहराई को उजागर करती है। इसमें मनुष्य के उस भाव को चित्रित किया गया है जहाँ वह प्रकृति या ईश्वर की अदृश्य उपस्थिति को महसूस करता है—एक ऐसा विश्वास जो जीवन को समेटता है, उसे संपूर्णता देता है। प्रतीक्षा केवल किसी घटना की नहीं, बल्कि उन सूक्ष्म संवेदनाओं, विरासत की प्रतिध्वनियों और जीने के अनगिनत रंगों की है। यह प्रतीक्षा जीवन की हर ध्वनि, रूप, पहचान और संबंध को आत्मसात करने की है, जिसमें प्रकृति और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अंश समाहित हो। कविता कहती है कि सच्ची प्रतीक्षा वही है, जिसमें जीवन और ब्रह्मांड के साथ एकत्व का अहसास जुड़ा हो।

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बेटियों का दर्द

बेटियाँ अपने मन का दर्द बार-बार चीख़ कर कहना चाहती रहीं। उनकी मासूम आँखों से गिरते आँसू और थरथराती आवाज़ें उनके भीतर छिपी पीड़ा का सबूत थीं। पर अफ़सोस, इस दुनिया ने उन चीख़ों को कभी सुनना ही नहीं चाहा। उनके शब्द हवा में गूँजते रहे, मगर कानों तक पहुँचने से पहले ही जैसे दीवारों से टकराकर बिखर जाते। समाज की बेरुख़ी इतनी गहरी थी कि मानो किसी को कोई ख़बर ही न हो कि बेटियाँ टूट रही हैं, बिखर रही हैं और भीतर ही भीतर मर रही हैं।

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