आसान नहीं है पुरुष होना…

पुरुष होना कई मायनों में सरल नहीं। दुनिया उन्हें मजबूत देखना चाहती है, मगर दर्द छुपाने की कला में वे अक्सर अकेले पड़ जाते हैं। हम लड़कियाँ आँसू पोंछने को काजल-लाइनर का सहारा ले लेती हैं, मुस्कान को लिपस्टिक से गहरा कर देती हैं। पर पुरुष? वे रोते भी कम हैं और जब रोते हैं तो छुपाने की सुविधा भी कहाँ होती है उनके पास।

Read More

बेटियों का दर्द

बेटियाँ अपने मन का दर्द बार-बार चीख़ कर कहना चाहती रहीं। उनकी मासूम आँखों से गिरते आँसू और थरथराती आवाज़ें उनके भीतर छिपी पीड़ा का सबूत थीं। पर अफ़सोस, इस दुनिया ने उन चीख़ों को कभी सुनना ही नहीं चाहा। उनके शब्द हवा में गूँजते रहे, मगर कानों तक पहुँचने से पहले ही जैसे दीवारों से टकराकर बिखर जाते। समाज की बेरुख़ी इतनी गहरी थी कि मानो किसी को कोई ख़बर ही न हो कि बेटियाँ टूट रही हैं, बिखर रही हैं और भीतर ही भीतर मर रही हैं।

Read More