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बुरहानपुर की प्रतिभाशाली बच्चियों को उपलब्धियों के लिए सम्मानित करते हुए।

मेहनत की खुशबू से महका कारवाँ

बच्चों की मेहनत, प्रतिभा और सफलता जब गुरु के आशीष से जुड़ती है, तो हर उपलब्धि खास बन जाती है। सिद्धि के गीत, वैष्णवी का अभिनय, कियरा का नृत्य और आराध्या की चित्रकला को समर्पित यह कविता बच्चों के सपनों और उनकी जीत का उत्सव है।

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बेटी के संग अनदेखे शहर की दहलीज़ पर

“अभी तो उस नन्हें हाथ के कोमल स्पर्श का एहसास मेरे हथेली से गया ही नहीं और पलक झपकते इतने वर्ष बीत गए कि अब उसी नन्हीं परी से हाथ छुड़ाते उसे एक परिपक्व छात्रा के तौर पर एक अंजान शहर में उच्च शिक्षा के सपनों को साकार करने भेज रही थी। मन में असंख्य भाव उठ रहे थे, पर चेहरे पर दृढ़ता का आवरण ओढ़े मैंने सिर्फ बेटी के आत्मविश्वास को सँभालने की कोशिश की। शाम होते-होते जहाज के पहिए उस नए शहर की धरती पर रुक गए और दिल से निकली बस एक ही दुआ – ‘हे प्रभु! मेरी बेटी की राहें हमेशा सुगम और सफल बनाना।'”

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वो जो गुलज़ार थी …

मेरे नैहर की छत पर बनी वह छोटी-सी कोठरी कभी मेरे कच्चे सपनों से गुलज़ार रहती थी। उसकी छत की कड़ियों पर न जाने कितनी कोमल कहानियाँ लिखी थीं। दीवारों ने मेरे दिल की मीठी बातें सुनीं और खूँटियों पर मेरी अधूरी ख़्वाहिशें टँगी रहीं। चूने से पुती दीवार की दरारों में मेरी बचकानी कविताएँ छिपी थीं, जिन्हें आज खोजने पर भी नहीं मिलता।
आँगन में मेरी खिलखिलाहटों की गूँज थी, ज़ीने पर दौड़ते कदमों की थाप थी और दरवाज़ों पर हथेलियों की छाप। उस सँकरी दीवार पर, जो दो छतों को जोड़ती थी, मैं और दीदी दौड़कर एक साँस में पार किया करते थे। दादी की डाँट और राहगीरों की नज़रें उस खेल की गवाह रहीं।
वह कोठरी सिर्फ़ छिपने की जगह नहीं थी, बल्कि कच्ची उम्र की नासमझियों का अड्डा भी। वहीं छिपकर कच्ची अमियाँ खाईं, वहीं बरगद के पत्तों पर कुल्फ़ी रखकर चखी और वहीं किताबें माँ-दादी से छिपाकर पढ़ीं। सहेलियों और दीदी के साथ बैठकर हमने न जाने कितनी बहसें कीं, ज़माने को बदलने के सपने देखे।आज उस कोठरी में टूटी छत और लटकी शहतीरें हैं। और उन्हीं शहतीरों पर मेरे अधूरे, कच्चे सपने अब भी झूल रहे हैं।

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मंज़िल मिल ही जाएगी

निरंतर प्रयास और पूरे विश्वास के साथ बढ़ते रहने से मंज़िल अवश्य मिलती है। चाहे राह में कठिनाइयाँ हों, नाव में छेद हों या अँधेरा छाया होहौसला और संकल्प टूटना नहीं चाहिए। छोटे-छोटे प्रयास, जैसे तिनकों से बना घोंसला, बड़ी बाधाओं का सामना कर लेते हैं। मेहनत ही वह चाबी है जो हर ताला खोलती है; अभ्यास से साधारण बुद्धि भी प्रखर हो जाती है। प्रेम, धैर्य और कर्म के साथ आगे बढ़ने वाला व्यक्ति अंततः अपनी मंज़िल पा ही लेता है।

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“बालकनी में खड़ी स्वतंत्रता तलाशती महिला”

उड़ेगी एक दिन वो…

यह कविता एक स्त्री की कहानी है, जिसे परिंदे के रूपक में प्रस्तुत किया गया है। यह केवल उड़ान की बात नहीं, बल्कि उस मानसिक और सामाजिक कैद की कहानी है, जिसमें अक्सर महिलाओं को सीमित कर दिया जाता है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। धीरे-धीरे वह फिर से अपने अस्तित्व को पहचानती है, छोटे-छोटे कदमों से खुद को संभालती है और उड़ना सीखती है। यह यात्रा आसान नहीं है यह डर, झिझक और आत्मसंघर्ष से भरी है लेकिन हर कोशिश उसे उसके असली आसमान के करीब ले जाती है।

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खिड़की के पास खड़ी दूरियों और अधूरे प्रेम में खोई एक स्त्री

मेरे साजन हैं उस पार…

कुछ दूरियाँ इतनी छोटी होती हैं कि उन्हें हथेलियों से मापा जा सकता है, लेकिन कुछ दूरियाँ उम्र भर समाप्त नहीं होतीं। ‘मेरे साजन हैं उस पार…’ अनकहे प्रेम, बिछोह, यादों और मन में रह गए अधूरे इंतज़ार की मार्मिक अभिव्यक्ति है।

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साहित्य पुरस्कार प्राप्त करती मुस्कुराती महिला, जिसके चेहरे पर संघर्ष से मिली सफलता की चमक है।

अव्वल दर्जे की बेवकूफ़

बार-बार ‘अव्वल दर्जे की बेवकूफ़’ कहकर अपमानित की गई सीमा ने हार नहीं मानी। धैर्य, संघर्ष और अपनी लेखनी के बल पर उसने न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी जीत भी हासिल की। यह एक संवेदनशील और प्रेरक हिंदी कहानी है।

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छोड़ आये अपना वो गांँव…

“छोड़ आये अपना वो गाँव” में कवि अपने बचपन और गाँव की यादों को भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करते हैं। यह कविता गाँव की सरल, प्राकृतिक और आत्मीय जीवन शैली के सुंदर चित्रण से भरी है—बैलगाड़ियाँ, खेतों की हरियाली, पनिहारन की पायल की झनकार, बुजुर्गों की चौपाल और सुबह की ग्रामीण रौनक। शहर की चमक-धमक, गगनचुंबी इमारतें और व्यस्त जीवन के बीच कवि को गाँव की मिट्टी, पेड़ों की छांव और अपनापन याद आता है। कविता यह दर्शाती है कि चाहे जीवन कितनी भी व्यस्त या आधुनिक क्यों न हो, अपने गाँव और सरल जीवन की याद हमेशा हृदय में बनी रहती है, और व्यक्ति को फिर से लौटने की लालसा जगाती है।

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स्त्री का संवेदनशील चित्रणजो हर मौसम में दूसरों के लिए बदलती है

एक औरत

“एक औरत मुस्कुराते हुए ढाल लेती है खुद को
तुम्हारी ज़रूरत के हर मौसम में… पर क्या तुम ढाल सकते हो खुद को उसकी मुस्कुराहट के लिए?”
एक छोटा सा सवाल, जो रिश्तों की पूरी सच्चाई खोल देता है।

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