जिंदगी भर नहीं भूलेगी मेट्रो की वो रात…

एक भागती-दौड़ती मुंबई की रात में, मैं मेट्रो के सफर पर थी, अपने बैग और गिफ्ट बॉक्स के साथ, साड़ी में शाही अंदाज़ लिए। एक अजनबी सज्जन ने बिना किसी शब्द के मेरी मदद की, मेरा सामान लौटाया और बाद में टिकट लेने में भी सहायता की। हमारी अनौपचारिक बातचीत, मुस्कानें और छोटे-छोटे इशारे उस रात को यादगार बना गए। सफर के बीच हमारी बातचीत इतनी सहज और हल्की थी कि समय का पता ही नहीं चला। उनके व्यवहार में न तो अश्लीलता थी, न कोई लालसा सिर्फ मित्रवतता और आदर।

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औषध या टोना

“ज्ञान जब अज्ञान में डूब जाए तो टोना कहलाता है…
पर समझो तो वही औषध है, वही विद्या।” गाँव के लोग जिन शब्दों को मंत्र समझते थे, वे दरअसल उपचार थे और जिस औरत को ‘डायन’ कहा गया, वही जीवन लौटाने वाली वैद्य निकली। विश्वास और अंधविश्वास की पतली सरहद उस रात फिर धुंधली हो गई।

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उस शाम…

उस शाम का मौन बहुत कुछ कह गया। आपके कहने का इंतज़ार नहीं था मुझे, क्योंकि आपकी नज़रें और आपकी ख़ामोशी ही मेरे दिल तक उतर आई थीं। वह अहसास किसी अनदेखी धारा की तरह मेरे हृदय को छूता चला गया। आसमान पर टिमटिमाते तारे हमारे साक्षी बने और हरसिंगार की महक ने आपके मन की अनकही बात मुझ तक पहुँचा दी। हम आमने-सामने थे, और ऐसा लगा जैसे हमारे दिलों के द्वार सदियों से एक-दूसरे की प्रतीक्षा कर रहे हों। दूर तक फैली चाँदनी ने हमें घेर लिया और हरसिंगार की माला ने हमारी आत्माओं को एक सूत्र में बाँध दिया। उस पल न समय का कोई बंधन था, न दूरी की कोई दीवार—बस आप थे, मैं थी और हमारा गहरा, मौन प्रेम।

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अधूरी बारिश की दास्तान

गाँव का पता ही भूल गया हो। बादल चिट्ठियों की तरह आते हैं, लेकिन बिना संदेश दिए लौट जाते हैं। जिन पर “देवभूमि” लिखा होता है, वहाँ तो मेघदूत की तरह वे आँसू और वज्र के साथ बरसते हैं, पर यहाँ आँगन उमस और प्रतीक्षा में सूखा पड़ा है। खपरैल की छतें अब भी बारिश का पानी सोखने को तैयार बैठी हैं, और पेड़ों से पत्ते पीले होकर झरते जा रहे हैं। इस चित्रण में वर्षा की अनुपस्थिति केवल मौसम का अभाव नहीं है, बल्कि एक गहरी भावनात्मक कमी और विरह का प्रतीक बन जाती है।

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बसंत ऋतु में खिले फूलों, कोयल और भँवरे के बीच प्रकृति सौंदर्य निहारती भारतीय ग्रामीण स्त्री

ऋतु बसंत आयो री…

“ऋतु बसंत आयो री” प्रकृति के नवजीवन, प्रेम और उल्लास का काव्यात्मक उत्सव है। शीतल बयार, खिले सुमन, कोयल की कूक और मन के हिलोर के माध्यम से यह कविता बसंत ऋतु की जीवंत अनुभूति कराती है।

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तन्हाई और मोहब्बत के दर्द को दर्शाती हिंदी ग़ज़ल की भावनात्मक प्रस्तुति

मोहब्बत, खामोशी और कसक

कभी-कभी मोहब्बत शब्दों से नहीं, खामोशियों से समझ आती है। सामने वाला साथ होने का दावा करता है, लेकिन हर भीड़ में एक अजीब-सी तन्हाई घिर आती है। यादें तस्वीरों में कैद तो हो जाती हैं, मगर उनमें छिपी खाली जगह हर बार दिल को चुभती है। शायद यही इश्क़ की सच्चाई है जहाँ चाहत तो पूरी होती नहीं, और उसकी कसक हर पल साथ चलती रहती है।

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श्याम रंग में भीग चला मन

इस कविता में रचनाकार भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपने गहरे प्रेम और आध्यात्मिक लगाव को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करता है। वह पाठक को कृष्ण के धाम की ओर जाने का निमंत्रण देता है — उस पावन भूमि की ओर, जहाँ संध्या होते ही गोपियाँ नृत्य करती हैं और हर दिशा भक्ति-रस में भीग जाती है। श्रीकृष्ण की एक झलक पाकर ऐसा अनुभव होता है मानो मृत्यु भी अब भयावह नहीं, बल्कि सुखद और शांति देने वाली हो गई हो। यह भाव उस आत्मिक स्थिति का संकेत है जहाँ ईश्वर-दर्शन के बाद जीवन-मरण का बंधन अर्थहीन प्रतीत होने लगता है। रचनाकार के लिए कृष्ण केवल एक देवता नहीं, बल्कि प्रेम और सत्य के प्रतीक हैं। उनके भीतर एक ईश्वरीय आभा और तेज है, जो उन्हें औरों से अलग बनाता है, यहाँ तक कि राम से भी। यह तुलना विरोध नहीं, बल्कि भावों की भिन्नता को दर्शाती है — राम मर्यादा के प्रतिनिधि हैं, तो कृष्ण प्रेम के।

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पुरानी कलाई घड़ी और उसके साथ रखी पारिवारिक यादें, जो भावनात्मक लगाव और स्मृतियों का प्रतीक हैं।

घड़ी

यह कविता एक साधारण-सी घड़ी से जुड़े गहरे भावनात्मक संबंध को व्यक्त करती है। पिता द्वारा विवाह में उपहार में दी गई घड़ी केवल समय बताने का साधन नहीं, बल्कि प्रेम, दुआओं और स्मृतियों की अमूल्य निशानी बन जाती है। उसके खो जाने के बाद भी उससे जुड़ी यादें मन में जीवित रहती हैं।

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पेट्रोल या हाइब्रिड: कौन है ज्यादा फायदे का सौदा?

पेट्रोल कारों और स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड वाहनों के बीच माइलेज का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन इसके साथ ही हाइब्रिड तकनीक की कीमत भी लाखों रुपये ज्यादा है. ऐसे में कार खरीदने की योजना बना रहे ग्राहकों के सामने यह बड़ा सवाल है कि बेहतर माइलेज के लिए ज्यादा पैसे खर्च करना सही फैसला है या नहीं.

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घर के कोने में अकेली बैठी एक भारतीय महिला, शांत लेकिन उदास चेहरा, पास में सजा हुआ घर और दीवार पर टंगी परिवार की तस्वीरें

मुझे अच्छा नहीं लगता…

“मुझे अच्छा नहीं लगता” एक संवेदनशील हिंदी कविता है, जो एक गृहिणी के अनदेखे श्रम, भावनात्मक अकेलेपन और उपेक्षा के दर्द को उजागर करती है। यह रचना उन स्त्रियों की आवाज़ है, जो परिवार के लिए सब कुछ समर्पित कर देती हैं, लेकिन बदले में मान-सम्मान की कमी महसूस करती हैं।

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