जीवन चक्र और अंतिम विदाई

50 वर्षों का साथ, सुख-दुख की साझेदारी और परिवार की खुशियाँ — सब एक क्षण में बदल जाती हैं जब जीवन साथी इस संसार से विदा हो जाता है। यह अनुभव अकेलेपन, स्मृतियों और जीवन के चक्र की गहनता को सामने लाता है। इस लेख में हम एक पति के दृष्टिकोण से उस अंतिम विदाई और जीवन के अनुभवों की झलकियाँ साझा कर रहे हैं, जिन्होंने वर्षों तक परिवार और बच्चों के लिए समर्पण किया।

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बिदाई

बिदाई -गीता गैरोला मैं पतझड़ में खड़ा पेड़ हूं जिसे अपनी पत्तियों को विदाई देनी है जन्म के लिए मृत्यु उतनी ही जरूरी है जितनी मृत्यु के लिए जन्म जरूरी है मैं अपनी मिट्टी में उत्तप्त ऐसे खड़ी हूं जैसे मरने से पहले कोई प्रेम करने को आतुर खड़ा हो  या मरने के तुरंत बाद…

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छप्पन भोग और खाटू श्याम दरबार ने बांधा श्रद्धालुओं का मन

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस का आयोजन आज अत्यंत भक्तिमय, उल्लासपूर्ण और आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। कथा स्थल श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति से गुंजायमान रहा। हर ओर “श्रीकृष्ण” नाम का संकीर्तन, भक्ति गीतों की मधुर ध्वनि और श्रद्धा की तरंगें वातावरण को पावन बना रही थीं।

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महिदपुर रोड में गुरु सप्तमी महापर्व की रहेगी धूम

महिदपुर रोड स्थित श्री स्थानीय सुविधिनाथ जैन मंदिर में गुरु सप्तमी महापर्व के अवसर पर प्रभात फेरी, भक्तांबर पाठ, गुरु इक्कीसा, गुरुपद महापूजन, महाआरती एवं भक्ति संध्या सहित विविध धार्मिक आयोजनों का भव्य आयोजन किया जाएगा। इसमें महिला मंडल, बहु मंडल की सक्रिय सहभागिता रहेगी।

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रिश्ते आईसीयू में …

आईसीयू के दरवाज़े से आती बीप-बीप की आवाज़ रिश्तों की बची-खुची संवेदनाओं पर अंतिम प्रहार कर रही थी। अस्पताल की मशीनें बस शरीर को खींच रही थीं, और बाहर घरवाले—इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के स्मार्ट पैकेज में रिश्तों का अंतिम संस्कार तय कर रहे थे।”

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सफ़ेद में लिपटी लड़की

वह लड़की ज़िंदगी को प्रेम की तरह जीना चाहती थी .शहर की भागदौड़ से दूर, पहाड़ों और जंगलों के बीच, हवा में बाँसुरी की धुन सुनते हुए। उसके हाथ में हमेशा पेन रहता, और हर शब्द उसके दिल की गहरी भावना बन जाता। वह जानती थी कि मौत भी तभी खूबसूरत होगी, जब वह लिखते-लिखते उसे मिले. जैसे जीवन का हर पल उसके प्यार और उसकी स्याही में समा गया हो।

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…कहीं आपको भी तो नहीं है फोन एडिक्शन

डिजिटल युग में स्मार्टफोन हमारी दिनचर्या का बड़ा हिस्सा बन चुका है, लेकिन सुविधा और मनोरंजन के बीच उसकी लत कब लग जाती है, कई बार हमें पता भी नहीं चलता। लंबे समय तक सोशल मीडिया स्क्रॉल करना, नोटिफिकेशन के बारे में लगातार सोचना, फोन पास न होने पर बेचैनी ये सभी संकेत बताते हैं कि हमारा डिजिटल व्यवहार नियंत्रण से बाहर हो रहा है। समय रहते सीमाएँ तय करना और ऑफलाइन जीवन को महत्व देना मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बेहद आवश्यक है।

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विद्योत्तमा साहित्य सुधाकर सम्मान 2026 से सम्मानित होने वाले ग़ज़लकार डॉ. प्रमोद कुमार कुश तन्हा

डॉ. प्रमोद कुमार कुश को विद्योत्तमा साहित्य सुधाकर सम्मान

सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार डॉ. प्रमोद कुमार कुश ‘तन्हा’ को उनके ग़ज़ल-संग्रह ‘लकीरों का सफ़र’ के लिए 2026 का विद्योत्तमा साहित्य सुधाकर सम्मान नासिक में भव्य समारोह में प्रदान किया जाएगा।

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मां…

“मॉं” में माँ को जीवन का आधार, हृदय की आवाज़ और आत्मा का सहारा बताया गया है। माँ केवल काया नहीं, बल्कि माया, अनुशासन, संस्कार और ईश्वर की आराधना का प्रतीक हैं। बच्चे की किलकारी, परिवार का बंधन और घर की यादें माँ की खुशी और शक्ति का हिस्सा हैं। कविता यह दर्शाती है कि माँ का अस्तित्व, उनका स्नेह और उनका मार्गदर्शन जीवन की हर परिस्थिति में अनमोल हैं और उनके नाम का पन्ना कभी फटता नहीं।

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ख़ामोशी के पते

कुछ पतों के पते कभी मिलते नहीं, और कुछ खतों के जवाब लौटकर नहीं आते। ये कविता अधूरी मोहब्बत, अनकहे जज़्बात और खामोश इंतज़ार की एक सजीव तस्वीर पेश करती है—जहाँ भावनाएं शब्दों से कहीं ज़्यादा कह जाती हैं।

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