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एक भारतीय बेटी आत्मविश्वास के साथ खड़ी है, जो “पराया धन” जैसी सामाजिक सोच से परे स्वतंत्र पहचान और आत्मसम्मान का प्रतीक है।

बेटियाँ पराया धन नहीं

“पराया धन” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि वह सामाजिक सोच है जो बेटियों को अपने ही घर में अस्थायी महसूस कराती है। यह लेख स्त्री की स्वतंत्र चेतना, आत्मसम्मान और भावनात्मक सबलता की आवश्यकता पर गंभीर प्रश्न उठाता है और समाज से आग्रह करता है कि बेटियों को संपत्ति नहीं, स्वतंत्र व्यक्तित्व की तरह देखना सीखे।

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अक्षय तृतीया 2026 आज: पूजा का शुभ मुहूर्त, सोना खरीदने का सही समय और महत्व

आज है अक्षय तृतीया: एक दिन जो कभी खत्म नहीं होता !

अक्षय तृतीया का पर्व आज पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। इस अबूझ मुहूर्त पर किए गए दान, निवेश और शुभ कार्यों का फल अक्षय यानी कभी न खत्म होने वाला माना जाता है। जानें पूजा का शुभ समय, सोना खरीदने का सही मुहूर्त और इस दिन का आध्यात्मिक महत्व।

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शशिकला पटेल को पीएच.डी. की उपाधि

मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा शशिकला पटेल को समावेशी शिक्षा पर किए गए उत्कृष्ट शोध के लिए डॉक्टरेट (पीएच.डी.) की उपाधि प्रदान की गई है। उन्होंने यह शोध गोखले कॉलेज ऑफ एजुकेशन एंड रिसर्च, परेल में प्रो. (डॉ.) प्रशांत काले के मार्गदर्शन में पूर्ण किया। इस अवसर पर कई शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की उपस्थिति रही, जिन्होंने उनके शोधकार्य में सहयोग और प्रेरणा प्रदान की।

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सड़क पर घायल व्यक्ति की मदद करता हुआ संवेदनशील इंसान

मानवता..

यह कविता मानवता को एक जीवंत स्वर में प्रस्तुत करती है—जो कभी समाज की आत्मा थी, आज उपेक्षा और कठोरता के बीच संघर्ष कर रही है। फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में भी मानवता को अपने कर्म, साहस और संवेदना से जीवित रखे हुए हैं। यह रचना पाठक को याद दिलाती है कि मानवता के बिना संसार का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

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मंद मुस्कान के साथ खड़ी एक युवती, जिसकी आँखों में बचपन और प्रेम की मासूम यादें झलक रही हैं।

लम्हा

कुछ रिश्ते उम्र नहीं, एहसास जीते हैं। “लम्हा” कविता सोलह-सत्रह की मासूमियत, बचपन की खुशबू और प्रेम की कोमल मुस्कुराहटों को बेहद संवेदनशीलता से उकेरती है।

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पश्चिम रेलवे के 11 कर्मचारी महाप्रबंधक संरक्षा पुरस्कार से सम्मानित

पश्चिम रेलवे ने सुरक्षित रेल परिचालन में सतर्कता और समर्पण का परिचय देने वाले 11 कर्मचारियों को महाप्रबंधक संरक्षा पुरस्कार से सम्मानित किया, जिनकी सजगता से संभावित दुर्घटनाएं टल सकीं.

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अपुन की दादीगीरी

पाँचवीं से छठवीं में कदम रखते ही स्कूल मेरे लिए पढ़ाई से ज़्यादा एक अजीब अनुभव बन गया था। कक्षा में न विद्यार्थी थे, न प्रतिस्पर्धा सिर्फ़ मैं और मेरा वर्चस्व। पिता का अनुशासन, स्कूल में उनका रुतबा और मेरी अकेली उपस्थिति ने मुझे अनजाने ही “दादीगीरी” का ताज पहना दिया। यह दादीगीरी डर से नहीं, परिस्थितियों से उपजी थी. जहाँ सीखने के साथ-साथ प्रभुत्व भी अभ्यास का हिस्सा बन गया।

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टूटी हुई कठपुतली की डोरियों के साथ आत्मविश्वास से खड़ी एक भारतीय महिला, जिसके चेहरे पर आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और नई शुरुआत का भाव झलक रहा है। पृष्ठभूमि में अंधकार से उजाले की ओर जाता दृश्य नारी सशक्तिकरण और स्वतंत्र अस्तित्व का प्रतीक है।

कठपुतली

‘कठपुतली’ एक विचारोत्तेजक हिंदी कविता है, जो स्त्री को केवल रिश्तों या सामाजिक बंधनों तक सीमित नहीं करती, बल्कि उसे सृजन, चेतना, आत्मसम्मान और स्वतंत्र अस्तित्व का प्रतीक मानती है। कविता यह संदेश देती है कि स्त्री किसी की कठपुतली नहीं, बल्कि अपने जीवन की स्वयं निर्माता है। संवेदनशील शब्दों और सशक्त भावों से सजी यह रचना नारी सम्मान, समानता और आत्मविश्वास की प्रेरणा देती है।

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पत्रकारिता को धर्म की तरह धारण करने वाले पत्रकार दिनेशचंद्र वर्मा

स्वर्गीय दिनेश चंद्र वर्मा ने पत्रकारिता को सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि धर्म की तरह जिया। उनके लेख, विद्वत्ता और नैतिकता ने स्वतंत्र पत्रकारिता का आदर्श स्थापित किया। उनके व्यापक ज्ञान, गहरी समझ और अखबारों में लगातार प्रकाशित लेख उन्हें पत्रकारिता और साहित्य जगत में अनमोल बना देते हैं।”

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“देह, निर्णय और दरारें”

पितृसत्ता केवल सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि एक गहराई से जड़ें जमाई मानसिक संरचना है जो पुरुष को सत्ता और स्त्री को ‘अन्य’ मानकर उसके श्रम, निर्णय और देह पर नियंत्रण स्थापित करती है। यह लेख पितृसत्ता की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और आधुनिक सामाजिक परतों को खोलते हुए यह सवाल उठाता है कि आखिर हम ‘मनुष्य’ से ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ में कब और कैसे बंट गए?

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