ऐसी फ़ितरत का क्या करेंगे हम ?
यह ग़ज़ल प्रेम, किस्मत, दौलत और आत्मसम्मान पर उठते सवालों की दास्तान है, जहाँ हर शेर जीवन की सच्चाई से रू-बरू कराता है।

यह ग़ज़ल प्रेम, किस्मत, दौलत और आत्मसम्मान पर उठते सवालों की दास्तान है, जहाँ हर शेर जीवन की सच्चाई से रू-बरू कराता है।
लोकतंत्र आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ उसकी रीढ़ भीड़ और दिखावे के बोझ तले झुकती नजर आती है। चुनावी रैलियाँ संवाद नहीं, शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन गई हैं, जहाँ नागरिकों को गिना जाता है, समझा नहीं जाता। जनकल्याणकारी योजनाएँ अधिकार नहीं, बल्कि चुनावी उपहार की तरह परोसी जा रही हैं। इस पूरे परिदृश्य में मतदाता धीरे-धीरे ग्राहक में बदलता जा रहा है। फिर भी उम्मीद कायम है जब जनता सवाल पूछती है और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती है, तभी लोकतंत्र की झुकी हुई रीढ़ फिर से सीधी होने लगती है।
श्रावण मास में उज्जैन में बढ़ती भीड़ को देखते हुए पश्चिम रेलवे ने उज्जैन और संत हिरदाराम नगर (बैरागढ़) के बीच 26 जुलाई से 31 अगस्त तक रोज चलने वाली विशेष अनारक्षित ट्रेन की सुविधा शुरू की है। यह ट्रेन विशेष किराए पर चलेगी और महाकाल दर्शन को आने-जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए लाभकारी साबित होगी।
कुछ नज़ारे ऐसे होते हैं जो पूरी ज़िंदगी को समेटे रहते हैं। वे लौटकर फिर कभी नहीं आते, लेकिन जाते हुए भी दिखाई नहीं देते। कभी वे प्रेम-रस से भरे बादलों की तरह मन के भँवर को पागल बना देते हैं, तो कभी यादों के आकाश में उड़ते पंछियों की तरह हमें बीते दिन और रातें लौटा लाने को मजबूर करते हैं।
कुछ नज़ारे आँखों के काजल जैसे होते हैं, जो मन में फूलों की डोली सजा देते हैं और अपनी रंग-बिरंगी खुशबू से जीवन भर को महका जाते हैं। जब वे याद आते हैं, तो चेहरे पर एक मुस्कान ले आते हैं और यह अहसास कराते हैं कि जीवन में कोई प्यारा साथ है, जिसके साथ ज़िंदगी जीने लायक बनती है।
हर इंसान अलग है उसकी सोच, सहने की क्षमता, बोलने का तरीका और चुप्पी की भाषा भी अलग होती है। फिर भी हम एक-दूसरे में खामियाँ खोजने लगते हैं और यही खामियाँ धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी बना देती हैं। आज परिवार छोटे हो गए हैं, लेकिन दिलों के फासले बढ़ गए हैं। जहाँ पहले प्रेम और सम्मान झगड़ों पर भारी पड़ते थे, आज अहंकार और असहिष्णुता रिश्तों को तोड़ रही है। साथ रहते हुए भी अकेले हो जाना, शायद हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है।
मैं नारी हूँ, पर अबला नहीं। मेरे आँसुओं में कमजोरी नहीं है, बल्कि वह आग है जो सबको झुलसा सकती है। नारी ईश्वर की अनुपम रचना है। वह घर-आँगन और खेत-खलिहान में गीतों की तरह झूमती है। ममता की गागर और जीवन की धारा उसकी आत्मा में प्रवाहित हैं। वह सृजन की मिट्टी से गढ़ी गई और करुणा से सींची गई है।
फिर भी, कभी उसे भोग्या बना दिया गया, कभी जायदाद समझा गया, और कभी बंधनों में बाँध दिया गया। लेकिन वही नारी मातृशक्ति बनी, महिषासुर का वध किया और अपने परिवार की रक्षा करती रही। अब वह निर्भीक होकर खड़ी है, अन्याय से डरती नहीं और चुनौतियों का सामना करते हुए अपने अस्तित्व को आज़ाद कराती है। स्वतंत्र देश की स्वतंत्र नारी नवयुग का स्वर्णिम आगाज़ है।
यह कविता उस कटु सच्चाई पर चोट करती है, जहाँ विचार और कलम दोनों की नीलामी होने लगी है। जहाँ डर और लालच ने उन लोगों को भी झुका दिया, जो कभी सिद्धांतों के आसमान हुआ करते थे। आज हालात इतने बिगड़ गए हैं कि सच बोलने वाले लोग ही गायब हो गए हैं और जिन्हें समाज की आत्मा माना जाता था, वही बिक चुके हैं। अब सवाल सिर्फ़ यही है ये सिलिसिला किसने शुरू किया? और कब तक चलता रहेगा?
“दूब-धान” एक अत्यंत भावनात्मक हिंदी कहानी है, जो माँ की याद, मायके का खालीपन और बिछड़ते रिश्तों की गहरी संवेदनाओं को उकेरती है। यह मदर-डॉटर स्टोरी हिंदी नवरात्रि के भावनात्मक परिवेश में उस दर्द को सामने लाती है, जब एक बेटी अपने मायके लौटती है, लेकिन माँ की अनुपस्थिति हर कोने में चुभती है। “दूब-धान” केवल एक कहानी नहीं, बल्कि उन अनकहे एहसासों की अभिव्यक्ति है, जिन्हें शब्दों में कहना कठिन होता है। यह emotional hindi story हर पाठक के दिल को छू जाती है।
नारी केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि जीवन का उद्घोष है। नारी कई रूपों में विघटित है, गणना से परे, क्योंकि इसके रूप तो अगणित हैं। आज नारी अबला नहीं, बल्कि सबला बनकर अपने अधिकार और सम्मान के परचम लहरा रही है।
पुरुष प्रधान जगत में नारी अब पुरुष से कम नहीं है। नारी पृथ्वी की शक्ति है; बिना नारी के जगत शक्ति विहीन है। संपूर्ण सृष्टि में नारी के बिना सब कुछ ही अधूरा और स्तरहीन है। नारी केवल कामिनी नहीं, शस्त्र-शास्त्र की पर्याय है। नारी केवल जन्मदाता नहीं, बल्कि कभी-कभी मृत्यु भी बन जाती है।