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खंडाला घाट में ब्रेक फेल ट्रेलर ने मचाई तबाही

मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे पर शनिवार दोपहर खंडाला घाट में एक भीषण हादसा हो गया। खोपोली एग्जिट से खालापुर टोल नाके तक के तीव्र ढलान पर एक ट्रेलर के ब्रेक फेल हो गए, जिससे वह लगभग चार किलोमीटर तक बेकाबू होकर 24 वाहनों से एक के बाद एक टकरा गया। इस दर्दनाक हादसे में एक महिला की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि 21 लोग घायल हुए हैं, जिनमें दो की हालत चिंताजनक बताई जा रही है। हादसे के कारण मुंबई की ओर जाने वाला यातायात दो घंटे तक पूरी तरह ठप रहा, जिससे वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।

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मुस्कुराती बुज़ुर्ग माँ अपने बेटे-बहू के साथ घर के आँगन में खड़ी, परिवार के अपनापन और सुरक्षा का भावनात्मक दृश्य।

“छटती धुंध”

समाचारों में बुज़ुर्गों के साथ बढ़ते अत्याचार की खबरें मन में भय और भविष्य की चिंता भर देती हैं। लेकिन एक दिन बेटे-बहू का लिया गया छोटा-सा निर्णय एक माँ के जीवन की सारी धुंध छाँट देता है। पढ़िए “छटती धुंध”, परिवार, अपनत्व और बुज़ुर्गों के सम्मान का मार्मिक संदेश देती एक भावनात्मक लघुकथा।

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 वो लड़की

सोमेश की कंपनी में नया प्रोजेक्ट शुरू हुआ था, इसलिए अब उसे ऑफिस में ज़्यादा देर तक रुकना पड़ता था. इस बात से उसका मन खिन्न हो रहा था. दस बजे की मेट्रो से उतरकर वह ऑटो की ओर बढ़ा. जैसे ही वह ऑटो में बैठा, वैसे ही एक खुशबू का झोंका उसकी नाक से टकराया.
रुको, मुझे भी ले चलो, लगभग हांफते हुए उस लड़की ने कहा.
वो खूबसूरत चेहरा, हिरणी सी आंखें, बाल हवा में बिखरे हुए, साड़ी पहने हुए थी. कहते-कहते ही वह बैठ गई.अरे! ऐ, इन साहब ने ऑटो रुकवाया है, तुम किसी और में चली जाओ, ऑटो वाले ने डपटते हुए कहा.

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अंबुबाची मेला 2026: शक्ति, प्रकृति और नारी सम्मान का अद्भुत उत्सव

अंबुबाची मेला: शक्ति, प्रकृति और आस्था का संगम

जब देवी कामाख्या होती हैं रजस्वला : कामाख्या मंदिर की अनोखी परंपरा रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) भारत की सांस्कृतिक विविधता में अनेक ऐसे पर्व और मेले हैं, जो अपनी अनोखी परंपराओं के कारण दुनिया भर का ध्यान आकर्षित करते हैं। असम के गुवाहाटी स्थित पवित्र कामाख्या मंदिर में आयोजित होने वाला अंबुबाची मेला ऐसा…

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सोना

प्रसव के बाद थकी-हारी गीतू मायके से किसी के आने की उम्मीद लगाए चिंतित है। आर्थिक तंगी और दूरी के कारण उसे लगता है कि कोई नहीं आएगा। मन में यह भी कसक है कि काश बेटी होती तो पिता का बोझ हल्का होता। तभी सासू माँ फोन पर सबको खुशी से बेटे के जन्म की खबर देती हैं और मालिशवाली को बुलाकर कहती हैं — सवा महीने बाद बड़ा फंक्शन होगा। गीतू अपनी चिंता बताती है कि मायके से सोना-चांदी आदि कैसे आएंगे, तो सास lovingly कहती हैं — “सोना-चांदी तो दादा-दादी की ओर से आएगा, तुमने हमें पोते के रूप में खरा सोना दिया है।” यह सुनकर गीतू भावुक होकर अपनी सास से लिपट जाती है अपनी दूसरी माँ की तरह।

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रह गया तो रह जाने दो

जीवन क्षणभंगुर है, और प्यार भी कुछ लम्हों का होता है। कभी-कभी साथ रहते हुए भी पल दूर हो जाते हैं। यादें, थोड़ी खुशी और थोड़े ग़म के साथ, हमें हर पल जीना सीखना होता है। जो आज है, वह कल नहीं रहेगा, इसलिए हर अनुभव को पूरी गहराई से महसूस करना ही जीवन का सार है।

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जब आता था कलाई करने वाला: पीतल के बर्तनों की यादें”

महिदपुर रोड की गलियों में, कलाई करने वाला अपनी भट्टी और चमकीले पीतल के बर्तनों के साथ आता था। तपेली, डेकची और लोटे—हर बर्तन उसकी कला की छाप लिए होते थे। बच्चों की जिज्ञासा, धुएँ की हल्की गंध और भट्टी की आंच—सब कुछ बचपन की यादों में अमिट छाप छोड़ गया। यह केवल बर्तनों की कहानी नहीं, बल्कि उस समय की जीवनशैली, रिश्तों और परंपरा की सजीव झलक है।

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‘अर्घ्य’ मराठी काव्य संग्रह का विमोचन

मुंबई में संपन्न हुई काव्य गोष्ठी में युवा कवि उमेश चव्हाण के मराठी काव्य संग्रह ‘अर्घ्य’ का विमोचन हुआ। कार्यक्रम में प्रमुख साहित्यकारों और कला-संस्कृति के गणमान्य व्यक्तियों ने पुस्तक की प्रशंसा की और कवियों ने अपनी रचनाओं की प्रस्तुति दी।

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मंच की चमक के पीछे छिपा सच और अकेला खड़ा एक लेखक

“हाय… क्या हो रहा है…

यह कविता समाज के उस बदलते चेहरे को उजागर करती है जहाँ सच बोलने वाले खामोश कर दिए जाते हैं और मंचों पर समझौते बिकते हैं। यह कलम की ईमानदारी और दिखावे की दुनिया के बीच का तीखा टकराव है।

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जब पेट की आग के आगे लोरी भी बेबस हो जाती है।

जहाँ रातें सिसकती हैं

यह कविता झोपड़ी में पलती गरीबी, भूख से बिलखते बच्चे और परिवार के लिए संघर्ष करती एक माँ की दर्दभरी कहानी कहती है। सिसकती रातों और टूटी उम्मीदों के बीच यह कविता समाज की कठोर सच्चाई को संवेदनशील शब्दों में सामने लाती है।

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