प्रेम, चुप्पी और यादों की कहानी

नंदा पाण्डेय, रांची (झारखंड)
उस साल सितंबर जल्दी आ गया था।
मानूसन की आख़िरी बूँदें अभी तक जालियों पर ठहरी थीं — जैसे किसी ने मोहलत माँगी हो।
दिल्ली यूनिवर्सिटी झील के इस पार स्थित ‘गर्ल्स हॉस्टल’ की ईंटें इतनी पुरानी थीं कि वे हर मौसम को अपने में दर्ज कर लेती थीं। कमरा नंबर ११, अमृता और श्रुति के नाम का था ।
अमृता, जो इतिहास में गोल्ड मेडलिस्ट थी, लेकिन ज़िंदगी के सवालों से अक्सर हार मान जाती। उसका घर पटना के पास एक कस्बे में था — मध्यमवर्गीय, पारंपरिक। पिता बैंक में थे, माँ घरेलू। एक छोटा भाई था जो हर बात पर हँस देता था, और वहीं बहन अमृता के अंदर एक चुप्पी बसती थी। जिसे अमृता अपने साथ दिल्ली यूनिवर्सिटी तक लेकर आई थी।
घर में ‘बेटियाँ ज़्यादा पढ़ जाएँ तो सोचने लगती हैं’ — यह वाक्य कई बार दोहराया गया था। अमृता जानती थी कि ये बातें उसके लिए ही है। पर उसका मन जिस ओर खिंचता है, वह उसके घर की दीवारों से बाहर की कोई चीज़ है। शायद यही कारण था कि वह कम बोलती थी — क्योंकि भीतर बहुत कुछ कहना होता था, पर कहने का रास्ता नहीं दिखता था। वो कम बोलती थी, लेकिन जब हँसती तो सामने बैठे लोगों के मन में हलचल मचा देती।
श्रुति, अमृता के बाद आई थी । श्रुति ने जब पहली बार हॉस्टल के कमरे में क़दम रखा, तो उसे लगा मानो किसी और के सपने में घुस आई हो। कमरे की दीवारें ताजा गुलाबी रंग में पुती थीं मगर उनमें एक घुला हुआ अकेलापन था, जैसे वे कई कहानियाँ बेमन से चुपचाप देख चुकी हों। एक कोना अधखुला था — उसमें पुराने कूलर की लोहे की साँकल थी, जो चलने से ज़्यादा रोने की आवाज देती थी।
श्रुति लखनऊ से आई थी — एक ऐसे घर से जहाँ बहस करना, अपनी बात कहना और कविताएँ पढ़ना सब कुछ सामान्य था। पिता साहित्य के अध्यापक थे और माँ रेडियो में काम करती थीं। उस घर में अमृता जैसी चुप्पी नहीं थी, लेकिन एक तरह की बेचैनी ज़रूर थी — खुद को खोजने की।
शायद इसी कारण जब उसने अमृता को पहली बार देखा, तो नज़रों के पार कुछ और भी देखा — कुछ ऐसा जिसे वह अपने शब्दों में नहीं बाँध सकी, पर जिसे वह जानती थी।
हॉस्टल के उस कमरे में दो बिस्तर था। एक पर श्रुति ने अपना सामान रखा ।उसने देखा दूसरे बिस्तर पर एक जोड़ी चाँदी की पायल पहले से रखी थी। होगा किसी का ..मुझे क्या करना!
कुछ ही देर में वहाँ आई अमृता — मुंबई की लड़की, थिएटर की छात्रा, चश्मा और जूते दोनों अजीब। बात करने के ढंग में मुंबई की सिनेमा वाली लचक थी, लेकिन चाल में एक तरह की बेपरवाही — जैसे वह दुनिया से कुछ मांगने नहीं आई हो, बल्कि अपना कुछ लौटाने आई हो।
श्रुति ने पहली ही नज़र में तय कर लिया — “बहुत बोलती होगी। थकाऊ।”
पर वक्त ने दिखाया — कुछ लोग जीवन में शोर नहीं लाते, लेकिन वो ख़ामोशियाँ बदल देते हैं।
अमृता कुछ खास नहीं बोली। उसने बस एक बार आँखें उठाकर श्रुति को देखा ,जैसे किसी पुरानी तस्वीर को देखा जाता है। फिर बिस्तर पर बैठकर अपनी किताबें समेटने लगी। श्रुति ने गौर किया उसके हाथों में एक किताब थी “अधूरी आवाजें ” किसी नाट्य समूह की स्क्रिप्ट जैसी ।
फिर उसने उसे इग्नोर किया कुछ भी हो मुझे उससे क्या।
उस रात, जब बिजली गई और मोमबत्ती जली, तो कमरे में लौ नहीं, दो लड़कियों की साँसें थीं जो दीवारों पर थरथरा रही थीं।
“तुम डरती हो अँधेरे से?” अमृता ने पूछा था।
श्रुति ने कहा था — “मैं उस उजाले से डरती हूँ जो झूठा हो।” और अमृता पहली बार मुस्कुराई थी।
गुलाबी दीवारों वाला कमरा और
कमरे में हल्की गुलाबी रोशनी , जैसे दीवारों ने कोई सपना ओढ़ रखा हो। यह श्रुति और अमृता के हॉस्टल का कमरा था। जहाँ अब किताबें , कविताएँ, और चाय के कप साथ- साथ इकट्ठे होने लगे थे।
अमृता, इतिहास में गोल्ड मेडलिस्ट थी, लेकिन ज़िंदगी के सवालों से अक्सर हार मान जाती। वो कम बोलती थी, लेकिन जब हँसती तो सामने बैठे लोगों के मन में हलचल मचा देती।
उस दिन जब दोनों पहली बार लाइब्रेरी में मिलीं। नज़रें पहले किताबों से टकराईं, फिर एक-दूसरे से।
श्रुति ‘नीलांबर’ के आख़िरी संस्करण में कुछ खोज रही थी, जब एक किताब ठीक उसी की आँखों के सामने से किसी ने उठा ली। वह पलटकर देखने ही वाली थी कि सामने अमृता खड़ी थी — आँखों में वही सवाल जो उसके मन में भी था।
“आपको भी यही चाहिए था?” अमृता ने पूछा, किताब को आधा आगे बढ़ाते हुए।
श्रुति थोड़ी झिझकी, फिर मुस्कराकर बोली, “हाँ, पर आप पहले आईं… वैसे भी, दो पाठक एक किताब से भी दोस्ती शुरू कर सकते हैं।”
अमृता ने आज पहली बार श्रुति को ध्यान से देखा । श्रुति की आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसी उन कविताओं में होती है जिनका उत्तर अभी लिखा नहीं गया हो।
“महादेवी को समझना इतना आसान नहीं,” अमृता ने धीमे से कहा।
श्रुति का चेहरा थोड़ा सा रोशन हुआ, “नहीं… बल्कि उन्हें सिर्फ पढ़ा नहीं जा सकता, जीना पड़ता है।”
श्रुति को तब पहली बार लगा था कोई है जो उसी पंक्तियों के बीच से गुज़रती है, जहाँ वो चल रही है।
अमृता हल्के से हँसी, “और जीने के लिए कभी-कभी खुद को थोड़ी देर के लिए खो देना पड़ता है।”
उस दिन से दोनों की शामें साथ साथ गुजरने लगी दो वाक्य, दो मुस्कानें, और एक साझा चुप्पी जो धीरे-धीरे किताबों की अलमारी से निकलकर उनके बीच आ बैठी।
धीरे-धीरे दोनों साथ साथ रहने लगीं ।लंच साथ करने लगीं, कविताएँ साझा करने लगीं, और फिर एक दिन जब पहली बार श्रुति ने अमृता का हाथ पकड़ा ,पहले तो अमृता चौंकी जैसे किसी पुराने डर ने उसके कंधे पर दस्तक दी हो। लेकिन फिर उसने अपनी उंगलियों को ढीले से श्रुति की हथेली में टिकने दिया। वह क्षण छोटा था, पर भीतर बहुत कुछ स्थिर हो गया था। उस एक पकड़ में न शब्द थे, न वादे सिर्फ एक मौन आश्वासन था कि ‘मैं समझती हूँ’।
उस दिन से कमरे की गुलाबी दीवारों की छाया जैसे और गहरा गई थी । जैसे उसने भी उस पल को अपनी परतों में सँजो लिया हो। बाहर कुछ नहीं बदला, लेकिन अंदर दोनों के बहुत कुछ बदल चुका था।
उस रात श्रुति ने अपनी डायरी में लिखा:
“अगर कोई रंग होता प्रेम का, तो शायद यही हल्की गुलाबी दीवार जैसा, जो उजाले और अँधेरे के बीच झूलता है। आज जब उसकी उंगलियाँ मेरी हथेली में ठहरीं, लगा जैसे कोई कविता पहली बार अपने पाठक से मिली हो। न ध्वनि थी, न भाषा — सिर्फ एक कंपन, जो मेरे पूरे अस्तित्व को लिखता चला गया।”
और श्रुति को तब पहली बार लगा था कोई है जो उसी पंक्तियों के बीच से गुज़रती है, जहाँ वो चल रही है।
अमृता के पास एक महक थी चन्दन और हल्दी जैसी। वो देर रात तक थियेटर की लाइनों का अभ्यास करती थी और श्रुति चुपचाप सुनती रहती। धीरे-धीरे, शब्दों से अधिक, उनकी चुप्पियाँ संवाद बन गईं।
उस शाम भी दोनों की हथेलियाँ साथ थीं कोई नाम नहीं, कोई वादा नहीं। बस एक साँझ और उसका ताप।
कॉलेज के गलियारों में whispers उगने लगे। “दोनों हर वक़्त साथ क्यों?” “कुछ तो है…”
अध्यापिकाएँ टोकने लगीं। श्रुति को बुलाकर कहा गया, “आप राजनीति विज्ञान की छात्रा हैं, आदर्श बनिए। इन सब में न उलझिए।”
श्रुति ने पूछा, “क्या प्रेम उलझन है?”
और उत्तर मिला, “समाज के लिए हाँ।”
अमृता ने इन बातों की परवाह नहीं की। वह अपनी आत्मा के रंगों को ज़िंदा रखे थी। मगर श्रुति? वह दो दुनिया में फँसी थी — वह जो प्रेम में थी, और वह जो डर में थी।
दिल्ली में सर्दी उतर आई थी। हॉस्टल की छत पर वे रोज की तरह चुपचाप बैठी थीं। अमृता की उंगलियाँ ठंडी थीं, लेकिन आँखें किसी और तापमान में डूबी हुईं।
श्रुति चाहती थी कि अमृता कुछ कहे कुछ भी। पर अमृता चुप रही।
“क्या तुम्हें डर लगता है?”
“हाँ,” अमृता ने कहा। “लेकिन डर इस बात का नहीं कि लोग क्या कहेंगे, डर इस बात का है कि मैं खुद से क्या कहूँगी।”
उसने फिर से वही बात दोहराई जो वह हर बार दोहराती थी “माँ को ये सब समझ नहीं आएगा। और बाबा… वो तो कभी मेरा नाम भी नहीं लेंगे।”
श्रुति ने कुछ नहीं कहा, बस अमृता के पास बैठ गई। कभी-कभी प्रेम कहना नहीं होता, पास बैठना होता है।
उस शाम जब अमृता चली गई, श्रुति वहीं छत पर देर तक बैठी रही। आसमान में चाँद अधूरा था जैसे किसी ने प्रेम को बीच में छोड़ दिया हो।
श्रुति ने डायरी में उसने लिखा:
“वो कुछ कहती नहीं थी, लेकिन हर बार उसकी चुप्पी में मैं अपना नाम सुनती हूँ।”
उन दिनों हॉस्टल की दीवारें सीलन से भरने लगीं थीं और दिल भीतर तक भीगने लगे थे।
अमृता पिछले दो दिन से गायब थी। उसका फोन बंद था और बैग वहीं पड़ा था – गुलाबी कमरे में।
तीसरे दिन दरवाज़ा खुला। वह आई, लेकिन आँखों में कुछ टूटकर गिरा हुआ था।
“घर गई थी,” उसने कहा।
श्रुति ने कुछ नहीं पूछा। लेकिन वो जानती थी, अमृता की चुप्पी अब सर्द हो गई थी। रात को वह जागती रही -अमृता की नींद देखती रही, जैसे उस नींद में कोई रहस्य छिपा हो।
सुबह एक ख़त मिला -अमृता का लिखा, बिना किसी संबोधन के
“कुछ रिश्ते पनपते हैं छाँव में, लेकिन जीने के लिए धूप चाहिए। मुझे अब धूप से डर लगता है।”
अमृता ने हॉस्टल छोड़ दिया था।
श्रुति को कमरे की गुलाबी दीवार अब बुझी हुई लगती थी। उसने पहली बार किसी से यह बात नहीं साझा की , न माँ से, न अपनी कविता में इसका जिक्र किया । सिर्फ़ उस खिड़की से कहा, जहाँ अब नीम का पत्ताअपनी डाल पर स्थिर था।
एक शाम बारिश फिर लौट आई थी, श्रुति ने वही पंक्ति दीवार पर दोहराई — जो पहले से वहाँ थी, लेकिन अब उसमें खुद को जोड़ा:
“अपने भीतर की सबसे सच्ची बात को मत छुपाओ… लेकिन यह भी जानो कि हर कोई उसे समझ नहीं पाएगा।”
कमरे में अब एक चुप्पी और आ बैठी थी — जो अमृता की थी, लेकिन धीरे-धीरे श्रुति की हो गई थी।
समय ऐसे बीत रहा था — जैसे कमरे के कोनों में जमी धूल, जो हटती नहीं, बस जगह बदलती जाती है। अमृता की अनुपस्थिति स्थायी हो चुकी थी, लेकिन श्रुति की स्मृति में वह अब भी उसी तरह जीवित थी — जैसे सुबह की सबसे पहली धूप, जो आँखें बंद करते ही महसूस होती है।
दो साल बीत चुके थे। श्रुति अब कोलकाता में एक महिला साप्ताहिक पत्रिका में सह-संपादक थी। शब्दों का संसार वही था, लेकिन अब उनमें अमृता की गंध कम हो चली थी — या शायद इतनी घुल चुकी थी कि अलग से पहचानना मुश्किल था।
लाइब्रेरी के कोने में बैठकर वह अब भी अमृता की लिखी पंक्तियाँ पढ़ती थी। उनके बीच जो कुछ नहीं हुआ था, वो ज़्यादा बोलने लगा था।
वो लाइब्रेरी अब भी वही थी, मगर अब उसकी सीट पर कोई और बैठता था। श्रुति कई बार वहाँ रुकती, अनजाने चेहरों को देखते हुए खुद से कहती, “अमृता कहीं नहीं गई, वह बस अब शब्दों में बदल गई है।”
एक बार एक कविता प्रतियोगिता में श्रुति ने हिस्सा लिया। शीर्षक था — भीतर की भाषा। उसकी कविता में कुछ अधूरा था, फिर भी निर्णायकों ने उसे चुना। शायद उन्होंने वह अधूरापन पढ़ लिया था जो कहने से ज़्यादा महसूस होता है।
उस शाम, पुरस्कार लेने के बाद, वह सीधे गर्ल्स हॉस्टल के गेट के पास पहुँची । जहाँ कभी वो और अमृता रहती थी। गेट की चौकीदार ने उसे देखा और कहा — दीदी आपकी उस दोस्त की चिट्ठियाँ अब भी आती हैं, जो पटना से आती थी। कोई ले नहीं गया अब तक।”
श्रुति ने पूछा — “क्या मैं देख सकती हूँ?”
वह चुपचाप उसे पुराना लिफाफा थमा गया। खोलने पर उसमें एक पुरानी तिथि की चिट्ठी थी:
“अगर कभी लौट सकी, तो उसी गुलाबी दीवार के नीचे बैठूँगी। लेकिन अगर न लौट सकी, तो जानना — मेरी आवाज़ अब भी तुम्हारे कमरे में है।”
श्रुति देर तक कुछ नहीं बोली। बस चिट्ठी को सीने से लगाकर हॉस्टल की उस खिड़की की ओर देखा — जो अब भी नीम की डाल के नीचे खुलती थी।
बारिश उस शाम भी वैसे ही लौट आई थी — जैसे अमृता लौटने की बात कर गई थी। लेकिन अब भीगना बाकी था।
उस दिन पार्क स्ट्रीट पर, जब वह एक पुराने किताबों की दुकान से निकल रही थी, सामने से आती एक लड़की से टकरा गई। किताबें गिरीं, और एक पुरानी डायरी ज़मीन पर आ गई। उस डायरी पर एक नाम लिखा था — A. Sinha.
श्रुति का दिल जैसे कुछ पल के लिए थम गया।
लड़की ने झिझकते हुए कहा, “माफ़ कीजिए, मैं… आप ठीक हैं?”
श्रुति ने सिर हिलाया। आँखें उस चेहरे पर ठहर गईं — अमृता थी। बाल थोड़े छोटे, चेहरे पर वही संकोच, लेकिन आँखों में कुछ थम चुका था — शायद डर, शायद प्रतीक्षा।
“तुम?”
“हाँ… मैं,” अमृता ने धीमे से कहा, “मैं सोच रही थी, अगर मिलूँगी तो क्या कहूँगी… और देखो, तुम सामने खड़ी हो।”
दोनों पास की एक कॉफी शॉप में बैठीं। पहले चुप्पी आई, फिर आँसू, फिर हँसी — जैसे वर्षों का मौसम एक ही कप में डूब कर छलक गया हो।
“तुम कैसी हो?” अमृता ने पूछा।
श्रुति मुस्कराई, “अब ठीक हूँ… अब शायद समझ गई हूँ कि प्रेम को संजोना होता है, उससे भागा नहीं जाता।”
अमृता ने धीरे से कहा, “मैं भागी थी… क्योंकि मैं खुद से डरी हुई थी। लेकिन अब मैंने खुद को समझना शुरू किया है। अब मैं नहीं भागती।”
कॉफी का आख़िरी घूंट पीते हुए श्रुति ने पूछा, “अब?”
अमृता ने उसका हाथ थाम लिया — पहली बार, खुले में, बिना डर के। बाहर सड़क पर भीड़ थी, गाड़ियों की चहल-पहल, लेकिन उनके बीच एक ठहराव था — जैसे दो सड़कें जो कभी अलग चली थीं, अब एक चौक पर मिल गई थीं।
शहर की गलियों में अब वसंत उतर आया था — पेड़ों पर नर्म पत्तियाँ, हवा में हरसिंगार की गंध, और उन दोनों के बीच एक नई चुप्पी, जो अब डर से नहीं, अपनत्व से उपजी थी।
अमृता ने कोलकाता में ही एक छोटा सा रीडिंग क्लब शुरू किया था — “अनकही” नाम से। वह अब खुलकर बोलती थी, लिखती थी, और लड़कियों को उनकी कहानियाँ कहने के लिए जगह देती थी। श्रुति अक्सर उसके आयोजनों में जाती, कभी बतौर श्रोता, कभी लेखक के रूप में, लेकिन हमेशा एक स्तम्भ बनकर।
एक शाम, जब क्लब के पांचवें सत्र का समापन हुआ, अमृता ने मंच से उतरकर धीरे से कहा — “आज तुम्हें एक कविता सुनानी है, जो अब तक तुमने कभी नहीं पढ़ी।”
श्रुति मुस्कराई। उसने डायरी से एक पन्ना खोला:
“कुछ रिश्ते लौटते नहीं,
पर ठहर जाते हैं
खिड़कियों की दरारों में,
पुराने चाय के कप में,
गुलाबी दीवार की छाया में…
और फिर
किसी दोपहर, जब नाम नहीं लिए जाते, तब भी आवाज़ें पहचानी जाती हैं।”
श्रोता चुप थे, जैसे कमरे में कुछ बहुत धीमे गिरा हो — शायद मौन, शायद स्वीकृति।
उस रात जब वे दोनों लौट रही थीं, अमृता ने सड़क के किनारे चलते हुए कहा — “हम अब क्या हैं, श्रुति?”
श्रुति ने मुस्कराते हुए जवाब दिया — “हम अब वही हैं, जो कभी कह नहीं सके। पर जो अब जी रहे हैं।”
फुटपाथ पर चलते हुए उनके साये एक हो गए थे — जैसे कोई अधूरी कविता अंततः पूरी हो गई हो।
लेकिन हवा में अब भी कुछ बाकी था — शायद वही जो प्रेम में हमेशा छूट जाता है, और फिर लौट आता है — एक नई कविता बनकर।
लेखिका के बारे में
नंदा पाण्डेय
समकालीन हिंदी कविता जगत की एक सशक्त और संवेदनशील हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाएँ मन के सूक्ष्मतम स्पर्शों को शब्दों में ढालने की अद्भुत क्षमता रखती हैं। राँची (झारखंड) में जन्मी नंदा जी की कविताओं में जीवन, प्रेम, प्रकृति और स्त्री-अनुभवों का गहरा और आत्मीय संसार बसता है।
उनके तीन एकल काव्य संग्रह— “बस कह देना कि आऊंगा”, “मनरँगना” और “पुटुस की चुप्पीयाँ”—उनकी रचनात्मक विविधता और भाव-गहनता के सशक्त प्रमाण हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 50 साझा काव्य संग्रहों में उनकी सक्रिय भागीदारी उन्हें समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में एक स्थापित स्वर बनाती है।कादम्बिनी, कथादेश, वागर्थ, आजकल, पाखी, परिकथा, वीणा मासिक और हिंदी-चेतना जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनकी कविताएँ पाठकों के मन में गहरी छाप छोड़ती हैं। नंदा पाण्डेय की लेखनी केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अनुभवों का सजीव दस्तावेज है—जहाँ हर शब्द एक एहसास बनकर पाठक के भीतर उतरता है।

बहुत अच्छी कहानी अंत तक बांधे रखा 👌