त्यौहार : खुशी की साझा भाषा

त्यौहार खुशी की साझा भाषा हैं, जो धर्म और परंपराओं से ऊपर उठकर लोगों को जोड़ते हैं। सोशल मीडिया के दौर में आवश्यकता है कि हम भिन्नताओं का सम्मान करते हुए, एक-दूसरे की खुशियों में सहभागी बनें और “जियो और जीने दो” के सिद्धांत को अपनाएँ।

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चाँदनी रात में हवा में लहराते लंबे बालों वाली महिला, जिसके आसपास भावनात्मक और रहस्यमयी माहौल है

जुल्फ़ तेरी

तेरी जुल्फ़ों की खुशबू और उनकी नरम छाँव में जैसे मैं खुद को भूलता चला गया। तेरी मौजूदगी में ऐसा सुकून मिला, मानो पूरी कायनात सिमटकर एक एहसास बन गई हो। लेकिन उसी चाँदनी रात में, जब भावनाएँ शब्दों में ढल रही थीं, कुछ ऐसा हुआ कि सारी इबारतें जलकर राख हो गईं। अब बस एक खामोशी, कुछ अधूरे जज़्बात और एक अनकहा सवाल रह गया है, जो आज भी दिल के किसी कोने से मुझे चुपचाप देखता है।

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फ़र्क

एक पल में तान्या का भरोसा टूट गया और माँ दुर्गा जाग उठीं। जिस चेहरे को उसने पिता का रूप मान लिया था, वही चेहरा बच्चों की सुरक्षा पर सवाल बन गया। उस दिन उसे समझ आया—रिश्ता होना और रिश्ता दिखना, दोनों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क होता है।

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परीक्षा केंद्र के बाहर सुरक्षा जांच से गुजरते भारतीय विद्यार्थी, जिनके चेहरों पर चिंता, उम्मीद और आत्मसम्मान के भाव दिखाई दे रहे हैं।

सपनों पर चलती लाठियाँ

यह कविता उन विद्यार्थियों की पीड़ा और संघर्ष को स्वर देती है, जो सपनों और उम्मीदों का बोझ लेकर शिक्षा के मंदिरों तक पहुँचते हैं, लेकिन कई बार सम्मान के बजाय संदेह और कठोरता का सामना करते हैं। कविता शिक्षा व्यवस्था, अनुशासन और संवेदनशील संवाद के बीच संतुलन की आवश्यकता पर गहरा प्रश्न उठाती है।

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अमन की जोत फिर जलाना है

यह जीवन बस एक बहाना है — सांसों का आना-जाना, रिश्तों का मतलब और फर्ज़ निभाने की रस्में। अमीरों की थालियाँ भरी हैं, मगर गरीब का निवाला उनसे छिन गया है। मुफ़लिसी की बातें अब किससे कही जाएं, जब ज़माना इतना बेरहम हो गया है।

आईने अब चेहरों को नहीं, दिलों को पढ़ने लगे हैं — नया चेहरा, मगर दिल वही पुराना। विज्ञान के इस दौर में इंसान चाँद पर घर बसाने की सोच रहा है, जबकि ज़मीन पर जंगल सूने और परिंदे बेघर हो गए हैं।

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स्वर्ग इसी जहाँ में

मनुष्य का असली मूल्य तभी है जब वह जीवन के अंधकार से उजाले की ओर बढ़ सके। अगर हम मृत्यु की चादर को हटाकर जीवन को नयी सुबह दे सकें, तभी हमारा अस्तित्व सार्थक है।
सच्चा जीवन वही है जहाँ हम प्रेम की एक बूँद पी भी सकें और किसी और को पिला भी सकें। जहाँ गिरने वाले को उठाने का सामर्थ्य हो, मुश्किलों में गीत गाने का साहस हो।
अगर हम अपने घर–आँगन को स्वर्ग में न बदल पाएँ, यदि दो दिलों की दूरियाँ कम न कर पाएँ, भूख से लड़ने के लिए रोटियाँ न जुटा पाएँ, और अन्याय देखते हुए भी आँख न उठा पाएँ—तो फिर चाँद पर जाने का क्या लाभ? ऐसे में हमें इंसान कहलाने का भी अधिकार नहीं।

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मैं नहीं जानती..

पितरों के प्रति सच्चे प्रेम, समर्पण और सेवा की भावनाओं को दर्शाता है। लेखक बताती हैं कि मृत्यु के बाद क्या होता है, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन जीवन में जो स्नेह, सेवा और प्रेम उन्होंने अपने पितरों को दिया, वही उनकी वास्तविक श्रद्धांजलि और पूजा है। जल-तर्पण, श्रद्धा, समर्पण और सेवा जैसी परंपराओं का सार वही है जो जीवन में किए गए कर्मों में प्रकट होता है। यह पाठ याद दिलाता है कि सच्चा धर्म और श्रद्धा भौतिक दान या रस्मों में नहीं, बल्कि अपने हृदय, कर्म और प्रेम में निहित होता है।

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किसको ढोओगे

कविता सत्ता, समाज और मानवता पर गहरा प्रश्न उठाती है। कवि पूछता है. आखिर तुम किसे अपने कंधों पर उठाओगे, किसे बचाओगे? जब नैया मझधार में डूबेगी, तब कौन किसे पार लगाएगा? सत्ता की लालसा में जो सबको मिटा देने की सोच है, वही अंततः विनाश का कारण बनेगी। भारत की धरती हर धर्म, हर जाति का आंचल है. यहाँ कीचड़ में भी कमल खिलता है। लेकिन जब राजनीति भाजन का रूप लेती है, तब वही ताक़त अपने ही हाथों से हार जाती है। गरीब, सच्चे, उज्जवल मन वाले लोग पूछते हैं. क्या हर चुनाव में बस हम पर ही डोरे डालोगे, क्या सबको साथ में मारोगे?

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पत्रकारिता को धर्म की तरह धारण करने वाले पत्रकार दिनेशचंद्र वर्मा

स्वर्गीय दिनेश चंद्र वर्मा ने पत्रकारिता को सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि धर्म की तरह जिया। उनके लेख, विद्वत्ता और नैतिकता ने स्वतंत्र पत्रकारिता का आदर्श स्थापित किया। उनके व्यापक ज्ञान, गहरी समझ और अखबारों में लगातार प्रकाशित लेख उन्हें पत्रकारिता और साहित्य जगत में अनमोल बना देते हैं।”

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