नारी द्वारा नारीत्व का परित्याग
समाज में नारी की भूमिका और नारीत्व आज गंभीर परिवर्तन का सामना कर रहा है। जहाँ सदियों से नारी को ममता, कोमलता और जीवन देने वाले स्वरूप के रूप में देखा गया, वहीं अब वही नारी कई परिस्थितियों में अत्याचार, विषाक्त जीवन और अन्याय के खिलाफ प्रचंड स्वरूप धारण कर रही है।
कई मामलों में नारी अपने बच्चों या परिवार के प्रति परंपरागत ममता के बजाय अपने जीवन के बंधनों से मुक्त होने का प्रयास करती है। यह कदम कभी-कभी उस विषाक्त वातावरण का प्रतिरोध होता है, जो उसे हर दिन मानसिक और शारीरिक रूप से चोट पहुँचाता है।
एक नीली सी नदी..
बरसों के अंतराल में, उस समय तुम बिना किसी रोक-टोक के प्रेम में डूबे थे, और मैं भी उसी प्रेम में भीग रही थी। तुम्हें नीला रंग पसंद था, और मैं नीलम की तरह दमक रही थी। हमारे शब्द एक मधुर लय में बह रहे थे, जैसे दो प्रेमी अपने सपनों के गीत गा रहे हों। मैं प्रेम की नदी बनी थी, और तुम, पुरुष, बांध बनाने के लिए पत्थर चुनने लगे। हमारे गीत उन पत्थरों से टकरा कर शब्द बनाते रहे, फिर धीरे-धीरे बिखर गए। तुम लगातार बरसते रहे, और मैं सूख गई।
सुनो पुरुष, प्रेम के घर बांधों से नहीं बनते, ये बहती नदी के नावों पर बनते हैं। व्यस्त हाथों के बावजूद, उस सूखी जमीन के भीतर अब भी एक नीली-सी नदी बह रही है। क्योंकि प्रेम में खो जाना भी प्रेम में होना ही माना जाता है।
कब आओगे तुम ?
यह रचना उस मन की आवाज़ है जो केवल साथ नहीं, बल्कि ऐसा प्रेम चाहता है जो खामोशियों को भी समझ सके और बिखरी हुई रूह को अपना घर दे सके।
कुछ पुरुष ऐसे भी होते हैं
कुछ पुरुष रिश्ते बड़ी आसानी से बनाते हैं और उतनी ही सहजता से तोड़ भी देते हैं. बिना किसी स्पष्टीकरण, बिना किसी टकराव के वे चुप्पी को हथियार बनाकर स्त्री को खुद ही रिश्ते से बाहर निकलने को विवश कर देते हैं. यह लेख उसी मौन छल, टूटते विश्वास और उस स्त्री की मानसिक पीड़ा की कहानी है, जो प्रेम को ईश्वर मान बैठती है और अंत में स्वयं को ठगा हुआ पाती है.
समय की तरह पुरुष…
औरतें अपने पुरुषों के समय का बहुत ख्याल रखती हैं। लेकिन अगर सच में ख्याल रखना है, तो जरा ‘समय’ नामक पुरुष का पीछा करके देखो—आखिर यह समय कहाँ जा रहा है? क्या तुम इसे रोक पाओगी, अपनी जुल्फों में, या कोमल त्वचा पर, या आंखों की चमक और घुटनों की ताकत पर? नहीं, रोक नहीं पाओगी।तो फिर क्यों उलझती हो पुरुष के साथ? समय की तरह ही पुरुष भी है—तेरा है तो रहेगा, नहीं है तो चला जाएगा।
मेघा, अब तो आओ
सूखी धरती मेघों को पुकार रही है. प्यासे खेत, तड़पते किसान और तपन से झुलसी दुनिया बादलों से जीवन-वर्षा की विनती करती हुई।
अरावली केस : सुप्रीम कोर्ट की अपने ही आदेश पर रोक
अरावली पर्वतमाला से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को जारी अपने ही आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी और तब तक किसी भी तरह की खनन गतिविधि नहीं की जाएगी। इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार और अरावली क्षेत्र से जुड़े चार राज्यों राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्लीसे इस मामले में जवाब तलब किया है।
