बरसो के अंतराल में,
साल के इन दिनों तुम ,
बिन बादल बरस रहे थे,
मैं भींग रही थी ।
तुम प्रेम में थे ..मैं प्रेम से थी,
तुम्हें नीला रंग पसंद ,मैं नीलम सी दमकती ।
प्रेम शब्दों में बहता है ,तीव्र – मधुर लय में,
शब्द उमड़ कर गूंथ रहे थे, आपस में गीत जैसे ,
दो प्रेमी उन गीतों में सपने गा रहे थे।
मैं प्रेम में नदी बनी ,
तुम पुरुष रह…बांध के पत्थर चुनने लगे ।
गीत पत्थरों से टकरा शब्द बने,
फिर अक्षर -अक्षर बिखर गए
तुम बरसते रहे..मैं सूख गई ।
सुनो पुरुष,
प्रेम के घर बांधों से नहीं बनते,
बहती नदी के नावों पर बनते हैं।
व्यस्त हांथो को रोक देखना कभी,
सूखी जमीन के बहुत अंदर एक ,
नीली सी नदी अब भी बहती है..
कि नदी का प्रेम में खोना भी
प्रेम में होना ही होता है।

सुनीतासिंह, कवयित्री, कोलकाता
