एक नीली सी नदी..

बरसों के अंतराल में, उस समय तुम बिना किसी रोक-टोक के प्रेम में डूबे थे, और मैं भी उसी प्रेम में भीग रही थी। तुम्हें नीला रंग पसंद था, और मैं नीलम की तरह दमक रही थी। हमारे शब्द एक मधुर लय में बह रहे थे, जैसे दो प्रेमी अपने सपनों के गीत गा रहे हों। मैं प्रेम की नदी बनी थी, और तुम, पुरुष, बांध बनाने के लिए पत्थर चुनने लगे। हमारे गीत उन पत्थरों से टकरा कर शब्द बनाते रहे, फिर धीरे-धीरे बिखर गए। तुम लगातार बरसते रहे, और मैं सूख गई।
सुनो पुरुष, प्रेम के घर बांधों से नहीं बनते, ये बहती नदी के नावों पर बनते हैं। व्यस्त हाथों के बावजूद, उस सूखी जमीन के भीतर अब भी एक नीली-सी नदी बह रही है। क्योंकि प्रेम में खो जाना भी प्रेम में होना ही माना जाता है।

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कुछ तो कहो…

यह कविता मानो दो हृदयों के बीच बसा एक मधुर संवाद है। कवि मौन को तोड़ने की विनती करता है, ताकि प्रेम की अनुभूति केवल हृदय में ही न रहे बल्कि शब्दों और भावों में भी प्रकट हो सके। इसमें अनुराग, लज्जा और समर्पण का सहज प्रवाह है। कहीं प्रेयसी का श्रृंगार उसकी प्रतीक्षा का प्रतीक बनता है तो कहीं प्रियतम का एक संकेत ही उसकी जीत ठहरता है। यह रचना प्रेम की उस अनकही भाषा को गूँज देती है, जिसमें मौन भी बोलता है और दृष्टि भी गीत गाती है।

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